Wednesday, April 30, 2008

कंङरेसिया बइमान

अभी हाल में ही ब्लॉग पर मंहगाई पर बहस चली थी...और इधर नागार्जुन को फिर से पढ़ रहा था तो लगा कि यह कविता आपसे साझा करूं. वैद्यनाथ मिश्र यात्री यानी बाबा नागार्जुन की सारी कविताएं साहस की कविताएं हैं. और यह भी अपवाद नहीं हैं. लीजिए साहस से साक्षात्कार कीजिए...

किसान

उठह भाइ किसान!
अपना दुक्ख अपने नहि बुझबह तँ के बुझतह आन
आबह तों सबतरि फहराबह लाले निशान
उठह भाइ किसान!

जमिन्दार पर जकर नजर छह, पूँजिपति दिश ध्यान
तकरा बुते कोना क' हेतइ गरिबहाक कल्यान
दिल्ली में नेहरू पटना मे सिरीकिसुन श्रीमान
गाल बजाबथि, भोग लगाबथि मेवा ओ मिस्टान
घोंघा गाँथि माला बनाओल, धएलक बक सन ध्यान
घर भरलक ओ धोधि बढ़ओलक कंङरेसिया बइमान
दिन दिन दुर्लभ अन्न, कंठ मे अटकि रहल छइ प्रान
एकमतिया ज नहि हेबह त भ जेबह हलकान
उठह भाइ किसान!

कविता मैथिली में है लेकिन आशा है कि इस भाषा से जो परिचित नहीं हैं उन्हें भी यह उतनी ही समझ में आएगी जितनी किसी मैथिली भाषी को आ सकती है. हमलोग इतने साहस से क्यों नहीं बोल पाते हैं, किसी गलत को गलत क्यों नहीं कह पाते हैं. हम ऐसी कविता क्यों नहीं कर पाते. कारण जाहिर है कि हममें साहस नहीं है और कविता करने के लिए साहस चाहिए. हम भाट बन सकते हैं चारण बन सकते हैं लेकिन कवि नहीं बन सकते हैं...कवि बस कहला सकते हैं. हम वास्तव में छोटे छोटे स्वार्थों के गुलाम हैं. इसलिए ऐसी कविता नहीं कर सकते हैं. अब देखिए कितने 'कवि' आज भी हैं लेकिन कितनी कविताएं इतनी हो पाती हैं. दिलो दिमाग पर पदवी, पुरस्कार व पैसे ने हमलोगों के कलम से पैनेपन को छीन लिया है. हम ब्लॉग तो लिखते हैं लेकिन हम देखते हैं यह कितने लोगों को खुश करेगी...कितने लोगों की पसंद बनेगी. आगे बढ़कर देखें, मैं आपकी पीठ थपथपाता हूँ आप मेरी थपथपाएं. इंटरनेट पर चिट्ठाकारी लगभग पूरी तरह से स्वतंत्र माध्यम है...न संपादक की कलम का डर, न प्रकाशक के छापने से मना करने का डर. हम ब्लॉग को भी कविता की तरह साहस की चीज बना सकते हैं हम ब्लॉग को साहस का ब्लॉग बना सकते हैं बशर्ते हम अपने लालच व कमीनेपन से इस माध्यम को दूर रखें.

3 comments:

जेपी नारायण said...

शाबाश राजेश भाई, बिल्कुल साफ-साफ, सही-सही आपने लिखा है, आपकी ये पंक्तियां उल्लेखनीय हैं....

हमलोग इतने साहस से क्यों नहीं बोल पाते हैं, किसी गलत को गलत क्यों नहीं कह पाते हैं. हम ऐसी कविता क्यों नहीं कर पाते. कारण जाहिर है कि हममें साहस नहीं है और कविता करने के लिए साहस चाहिए. हम भाट बन सकते हैं चारण बन सकते हैं लेकिन कवि नहीं बन सकते हैं...कवि बस कहला सकते हैं. हम वास्तव में छोटे छोटे स्वार्थों के गुलाम हैं. इसलिए ऐसी कविता नहीं कर सकते हैं. अब देखिए कितने 'कवि' आज भी हैं लेकिन कितनी कविताएं इतनी हो पाती हैं. दिलो दिमाग पर पदवी, पुरस्कार व पैसे ने हमलोगों के कलम से पैनेपन को छीन लिया है.

prashant said...

Bahut achha Rajesh jee.

रंजीत said...

Bhai rajesh
ahan ke bat se ham sahmat chee. kavita samyeek . ahank sabal par bahas chalik chahee.
Ranjit