Thursday, March 27, 2014

आम आदमी का ब्राउज़र आम आदमी से दूर क्यों

फ़ायरफ़ॉक्स मुक्त स्रोत के उन कुछ उत्पादों में से है जिनकी आम लोगों में पहुँच काफी ज़्यादा है। इसलिए जब सीएसडीएस के रविकांतजी ने हाल में 22-23 मार्च को रेड हैट पुणे कार्यालय में आयोजित मोज़िला हिन्दी सामुदायिक सम्मेलन में मोज़िला उत्पाद मसलन फ़ायरफ़ॉक्स ब्राउज़र, फ़ेनेक, ओएस आदि के हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं में पहुँच बढ़ाने के लिए हो रही चर्चा के दौरान एक ज़ुमला उछाला कि आम आदमी का ब्राउज़र आम आदमी से दूर क्यों (हिन्दी में) तो बात में काफी सचाई नज़र आई। इसमें कोई शक नहीं कि फ़ायरफ़ॉक्स आम आदमी का ब्राउज़र है। यह आम आदमी के द्वारा बनाया हुआ है। ब्राउज़र कैसा होना चाहिए इसका एक बड़ा हिस्सा स्वयंसेवी समुदाय देखती है। जहाँ तक भाषाई अनूदित ब्राउज़र की बात है लगभग सारा का सारा काम भाषाई समुदाय ही निर्धारित करते हैं। लेकिन इस ब्राउज़र के डाउनलोड अपेक्षाकृत काफी कम हैं और यह भारत की एक बड़ी सांस्कृतिक समस्या का हिस्सा भी है। बहरहाल, हमने फ़ायरफ़ॉक्स के डाउनलोड, उसके बाज़ार और संभावित श्रोता तक इसकी पहुँच सुनिश्चित करने को लेकर कुछ गंभीर बातें की। इस कार्यक्रम में मेरे साथ सीएसडीएस के रविकांत, दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी के लेक्चरर विभास चन्द्र वर्मा, आशीष नामदेव, उमेश अग्रवाल, शाहिद फारूकी, इंडलिन्क के गुंटुपल्ली करुणाकर, मेघराज सूथर, सूरज कावडे, संगीता कुमारी, चंदन कुमार, अनिकेत देशपांडे, हिमांशु आनंद, और अंकित गाडगिल मौजूद थे। इसकी विस्तृत रपट मैंने विभिन्न डाक-सूची पर भी भेजी है।

इस मीट-अप ने दो पीढ़ियों को एक मंच पर लाने में मदद की। बात-चीत की कमी जो सामान्य रूप से अलग-अलग परियोजना से जुड़े लोगों में दिखती है उसे पाटने की गंभीर कोशिश हुई। दो पीढ़ियों के बीच कितने आराम से, कितनी समरसता से बात हो सकती है और कैसे इसके जरिए बेहद ख़ूबसूरत तार्किक परिणति हासिल की जा सकती है - इसे इस छोटे से सम्मेलन की सफलता को देखकर सोचा जा सकता है। मैं इस कार्यक्रम को लेकर हालाँकि आरंभ में थोड़ा सशंकित था लेकिन ताज़ा ख़ून वाले ये सभी युवा बच्चे बेहद खुले और परिष्कृत सोच के रहे। हम इनके खुलेपन और सकारात्मक सोच के कायल हैं। हमने कई काम इस सम्मेलन के दौरान किए। हमने फे़नेक के अनुवादों की समीक्षा की - मौटे तौर पर। हमने बेवमेकर को नज़दीक से जाना। हमने सूमो की प्रक्रिया को गौर से सुना। हमने कोशिश की - लोगों को लोकलाइज़ेशन की बारीकियों से परिचित कराने की। और इन सभी कामों को हमारी युवा टीम ने किया - मिलकर। करूणाकरजी ने फ़ायरफ़ॉक्स ओएस के हिन्दी कुँजीपट पर काम किया और अनिकेत ने तुरत ही उसी आधार पर मराठी का भी काम समाप्त कर लिया। इस कार्यक्रम में काफी कम समय की सूचना पर सीएसडीएस के रविकांतजी और दिल्ली विश्वविद्यालय के लेक्चरर विभासजी आए और भाषा से जुड़ी काफी जरूरी बातें रखीं। फ़ेनेक की समीक्षा में जरूरी मदद के साथ ही उन्होंने फ़्यूल हिन्दी स्टाइल गाइड में अपेक्षित सुधार का ज़िम्मा भी अपने हाथ में लिया है।

इस कार्यक्रम की जो सबसे ख़ास बात रही - वह रही स्वामित्व के साझा किए जाने की। अभी तक अधिकतर फ़ायरफ़ॉक्स के काम मैं ही देखता था...सूमो और वेबमेकर को छोड़। मैंने पाया कि मुक्त स्रोत में लोग धीरे-धीरे लोग अपने प्रोजेक्ट से बेहद पजेसिव तरीके से जुड़ जाते हैं - एक नकारात्मक जुड़ाव। शाहिद और चंदन ने पिछले साल कुछ अनुवाद स्प्रिंट किए थे। कुछ मुझे भरोसा वहाँ से ही जगा था। मुझे अहसास हुआ कि महज काम के बंटवारे से आगे बढ़ना अब जरूरी है और नए लोगों को जोड़ना बेहद आवश्यक है - हमारी भाषा के लिए भी, मुक्त स्रोत के लिए भी। मैंने स्वामित्व के साझा किए जाने की सोची और सकारात्मक चर्चा के बाद इस मुकाम पर पहुँचा थोड़ी निश्चिंतता तो मुझे आई है और मैं सबका बहुत शुक्रगुजार हूँ। शाहिदजी ने इस कार्यक्रम के संयोजन और संकल्पना में महत्पपूर्ण सहयोग दिया है। मोज़िला रेप्स कॉउंसिल ने कार्यक्रम के लिए धन मुहैया कराया और रेड हैट ने इसकी मेज़बानी की। हम मोज़िला और रेड हैड के भी शुक्रगुजार हैं।

Friday, February 21, 2014

फुर्ती से सही-सही टाइप करें टाइपिंग-बूस्टर की मदद से

अगर आप अपनी टाइपिंग की गति से आज़िज हैं या फिर अपनी तेज़ गति को और तेज़ करने की सोच रहे और कोई रास्ता नहीं सूझ रहा है हैं निःसंदेह आप टाइपिंग बूस्टर आज़मा सकते हैं। टाइपिंग बूस्टर एक ऐसा औज़ार है जो आपकी अँगुलियों को आराम देता है और पाठ का अनुमान लगाकर आपको लिखने में मदद करता है। २०१० में आरंभ हुआ यह प्रोजेक्ट अब कई भाषाओं में है और अब यह बाएँ से दायीं ओर चलने वाली लिपियों का भी समर्थन करता है। फेडोरा में आप अगर इसे संस्थापित करना चाहते हैं तो काफी आसान है बस टर्मिनल खोलिए और रूट के साथ yum install ibus-typing-booster hunspell- लिखिए। आपकी सेवा में यह हाज़िर हो जाएगा।

गति को वाकई काफी बढ़ाने वाला यह टाइपिंग बूस्टर कई ख़ूबियों को लिए है। गति तो बढ़ती ही है लेकिन चूँकि यह साथ ही स्पेलचेकर की मदद भी लेती है तो आपकी गलतियाँ होने की उम्मीद कम रहती है। आंशिक इनपुट पर अनुमान, टैब से अगले अनुमानित अक्षर पर जाना, वर्तनी-जाँच, मनपसंद शब्द सूची, सभी महत्वपूर्ण कुँजी लेआउट का समर्थन, ४० से अधिक भाषाओं में समर्थन, बेहतर परिशुद्धता आदि कुछेक महत्वपूर्ण विशेषताएँ हैं। यह काफी आसान है उपयोक्ताओं के लिए।

कुछ सुझाव टाइपिंग बूस्टर के लिए। पहले तो यह उपयोक्ता द्वारा निर्धारित हो सकने वाला होना चाहिए कि हम कितने वर्णों के शब्दों को सुझाव के तौर पर चाहेंगे। इसके अलावा उदाहरण के तौर पर मैं "की" लिख चुका हूँ तो सलाह के तौर पर "की" नहीं दिखना चाहिए। साथ में संलग्न चित्र में इसे देखा जा सकता है। 



एक और दिक्कत आती है...अगर हम दो अक्षर लिख चुके हैं और दूसरे अक्षर को मिटाकर कोई और लिख देते हैं तो सलाह पूरे लिखे शब्दांश पर न होकर बाद में जोड़े गए वर्ण के आधार पर दिखाया जाता है। मेरी तरफ से बस इतना ही है।

आप भी आज़माएँ। हैंड-हेल्ड डिवायसों के ज़माने में इसकी और उपयोगिता है और इसलिए इनके डेवलपरों का साधुवाद और शुक्रिया।

Tuesday, February 4, 2014

जानकीपुल पर मेरे बेटे अमृत की कविताएँ

मेरे ग्यारह साल के बेटे अमृत की कविताएँ जब हिन्दी के जाने-माने साइट जानकीपुल पर छपी तो एकबारगी विश्वास नहीं हुआ। जानकीपुल हिन्दी साहित्य के गंभीरतम आलेखों, कविताओं, और चर्चाओं का प्रमुख अड्डा है। कविता में अमृत की रुचि है और वह काफी समय से लिख रहा है, लेकिन जानकीपुल पर भेजने में मैं काफी हिचक रहा था। मशहूर कथाकार प्रभातजी का शुक्रिया कि उन्होंने अपनी खूबसूरत मॉडरेटर टिप्पणी के साथ इसे छापा और मुझे लिखा भी कि अमृत में मौलिक प्रतिभा है और इसे बनाए रखिए।

माँ-बाप होने के नाते हमें अमृत की लिखी कविताएँ अच्छी तो लगती थीं लेकिन इतनी जबरदस्त प्रतिक्रिया आएगी सोचा भी नहीं था। प्रभातजी ने बताया कि इसकी कविताओं ने पेज व्यूज़ के पिछले सारे सालों के रिकार्ड को महज चंद दिनों में पीछे छोड़ दिया है। फेसबुक और साइट के पेज पर की गई टिप्पणियाँ बेहद सकारात्मक हैं। अमृत बहुत खुश भी  है। एक बार फिर प्रभातजी का शुक्रिया हमारी तरफ से।

Thursday, November 7, 2013

तो क्या अंगिका मर जाएगी?

21 जनवरी 2008 को मैरी स्मिथ जोन्स की मृत्यु हो गयी थी। मेरी जोन्स की मृत्यु महज एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं कही जा सकती। वह दक्षिणी मध्य अलास्का की एयाक भाषा बोलने वाली अंतिम जीवित व्यक्ति थी। उनकी मौत के बाद एयाक भाषा बोलने वाला एक भी व्यक्ति नहीं बचा। और इस प्रकार सीमित भाषायी विविधता वाले मौजेक से एक रंग हमने खो दिया। थोड़ा अजीब लग सकता है लेकिन भाषाएँ मरती हैं, लगातार मर रही हैं। हालाँकि पचने लायक बात नहीं लगती है लेकिन यह एक तथ्य है। कुछ-कुछ स्थिति शेर जैसे जानवरों की तरह है।

भाषाओं के मरने के कारण कुछ भी हो सकते हैं। अगर बोलने वालों की संख्या महज दो-एक है, तो साधारण सर्दी, खांसी, बुखार भी उस भाषा के मरने का तात्कालिक कारण बन सकता है। बाहरी ताकतों में सैन्य, आर्थिक, धार्मिक, सांस्कृतिक या शैक्षिक अधीनता, नरसंहार, प्राकृतिक आपदाएँ, बाँझपन, रोग, सांस्कृतिक/ राजनैतिक/आर्थिक आधिपत्य, राजनीतिक दमन आदि कारण हो सकते हैं। आंतरिक ताकतों में सांस्कृतिक सात्मीकरण एक बड़ा कारण है। भाषा-भाषी समुदाय की अपनी भाषा के प्रति नकारात्मक सोच भी एक बड़ा कारण है। भारी उत्प्रवासन और तेज नगरीकरण भी इसके लिए जिम्मेदार हैं।

बहुतेरी भाषाएँ मरने के कगार पर हैं। 96 प्रतिशत भाषाएँ मात्र चार प्रतिशत आबादी द्वारा बोली जाती हैं। 500 भाषाओं को बोलने वालों की संख्या 100 ही है; 1500 भाषाओं को 1000 से कम लोग बोलते हैं और 5000 भाषाओं को 100,000 से कम बोलने वाले हैं। धीरे-धीरे एक के बाद एक मरते जा रहे हैं। न केवल भाषाएँ मरती हैं; एक भाषा के साथ सामुदायिक इतिहास, बौद्धिक और सांस्कृतिक विविधता, सांस्कृतिक पहचान भी मर जाती हैं! यह क्षति सबकी क्षति है; एक तरह से स्थायी क्षति! करीब 3000 भाषाएँ अगले 100 साल में मर जाएँगी। हर दो सप्ताह में एक भाषा मर रही है। जितनी अधिक विविधता है, उतना ही अधिक खतरा है। और इसलिए भारतीय भाषाएँ भी उसकी जद में है। 197 भाषाएँ भारत में मरने के कगार पर हैं और उनमें से एक है हमारी अंगिका

यूनेस्को के भाषायी एटलस को देखें तो पाएँगे कि अंगिका की स्थिति नाजुक है। लुप्तप्राय भाषा को उसकी संकट की गंभीरता की स्थिति के आधार पर चार प्रकारों में बाँटा गया है। अंगिका अपने आरंभिक चरण में है। नाजुक यानी Vulnerable स्थिति में अधिकतर बच्चे तो उस भाषा को अब भी बोलते हैं लेकिन यह सीमित क्षेत्रों उदाहरण के लिए घर तक सीमित रह गया है। दूसरी स्थिति निश्चित रूप से लुप्तप्राय यानी Definitely endangered में बच्चे बतौर मातृभाषा अपनी भाषा को बोलना बंद कर देते हैं। अत्यधिक लुप्तप्राय यानी Severely endangered स्थिति में उस भाषा को बोलने वाले केवल पुरानी पीढ़ी के लोग हैं लेकिन माता-पिता अब अपनी भाषा को अपने बच्चों के साथ नहीं बोलते हैं। विकट लुप्तप्राय यानी Critically endangered स्थिति में उस भाषा को बोलने वाले केवल दादा-दादी-नाना-नानी की पीढ़ी के लोग हैं और वे लोग भी अपनी भाषा को आंशिक रूप से बोलते हैं। अंगिका संकट की आरंभिक स्थिति में दर्ज की गयी है।

डेविड क्रिस्टल के द्वारा परिभाषित भाषा की मौत के तीन चरण अंगिका और ऐसी ही किसी भाषा पर सटीक बैठ सकती है। मौत की ओर के तीन कदम में पहला है प्रभु भाषा बोलने का दबाव। बेहतर जीवन पाने की आशा में यह कदम लिए जाते हैं। धीरे-धीरे जनसंख्या द्विभाषी होती जाती हैं और आरंभिक द्विभाषीय स्वरूप धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है और आदमी एक ही प्रभु भाषा बोलने की कोशिश करने लगता है और अंततः एक ही भाषा बोलने लगता है। लोगों को अपनी भाषा बोलने में शर्म आने लगती है। और वह भाषा खत्म हो जाती है। लिनियर_ए और हरप्पा लिपि जहाँ उकेरी हुई हैं वह अब शांत, मौन और ठंडी पड़ गयी हैं। ग्रेंगर मियडर कहते हैं कि मैरी की तरह ये कोई कहानी कहने के लिए नहीं बची हैं।

हालाँकि अंगिका मुश्किल में दिखती हैं लेकिन स्थिति विकट नहीं है। बहुतेरे क्षेत्र में काम हो रहे हैं। अंगिका में साहित्य उपलब्ध हैं। लोग लिख रहे हैं। कुछेक फिल्में भी बनी हैं। सुना है कि शब्दकोश आदि भी तैयार किए गए हैं। लेकिन इस बदलते परिवेश में सबसे जरूरी है अंगिका को सूचना-प्रौद्योगिकी के पटल लाना, ताकि डिजिटल युग में हम अंगिका की मौजूदगी को रेखांकित कर सकें।

कई ओपन सोर्स प्रोजेक्ट हैं जहाँ अंगिका की उपस्थिति इसके वजूद को स्थायित्व प्रदान करेगी। फ्यूल प्रोजेक्ट एक ओपन सोर्स प्रोजेक्ट है और इसके तहत कंप्यूटिंग शब्दावली के निर्माण की दिशा में बढ़ा जाएगा। फ़ायरफ़ॉक्स, फेडोरा आदि को भी अंगिका में उपलब्ध कराना चाहिए और हम समुदाय की मदद से इस दिशा में शुरूआत भी हमने कर दी है। अंगिका लोकेल निर्माण का सबसे प्रारंभिक काम हमने पूरा कर लिया है और उम्मीद है कि जल्द ही एक भरा-पूरा डेस्कटॉप हम देखेंगे। हमने बिहार के मधेपुरा में एक कार्यक्रम भी किया था - सिद्धांत प्रकाशन के सहयोग से। कई रामलखन सिंह, हरिशंकर श्रीवास्तव, के.के.मंडल, सच्चिदानंद यादव समेत कई विद्वान उपस्थित थे। लोगों ने शिद्दत से महसूस किया कि अंगिका पर काम करना जरूरी है ताकि भाषा समेत एक भरी-पूरी संस्कृति को उसकी संपूर्णता में सहेजकर रखा जा सके। भागलपुर के डा. अमरेन्द्र ने भी लगातार सहयोग किया है और संबल बढ़ाया है। देखें, भाषा की सामुदायिक ताकत हमें कहाँ तक ले जाती है। जल्द ही हम भागलपुर में अंगिका कंप्यूटिंग पर एक गोष्ठी करेंगे।

भाषाएँ हमारी जड़ हैं और इन्हें सींचकर हम खुद को ही जिंदा रखेंगे। और सबसे महत्वपूर्ण रूप से कोई भाषा कमजोर या मजबूत नहीं होती हैं। एलिटेट नेम्टुश्किन की 'मेरी भाषा' कविता से यह पंक्ति उधार ले रहा हूँ - How can I believe the foolish idea /That my language is weak and poor /If my mother's last words /Were in Evenki?

Wednesday, July 10, 2013

मेरी पहली क़िताब - अपना कंप्यूटर अपनी भाषा में

'अपना कंप्यूटर अपनी भाषा में' मेरी पहली क़िताब है...हार्ड कॉपी :-)। अपने कंप्यूटर को आप अपनी भाषा में कर सकते हैं बस थोड़ा सा आपका जुनून चाहिए। यह किताब इसी प्रक्रिया को विस्तार से बताती है। रविकांतजी का बहुत-बहुत शुक्रिया क़िताब की प्रस्तावना के लिए। मित्र महेश भारद्वाज 
का शुक्रिया - मेरी पहली किताब छापने के लिए।

यह क़िताब मैंने माँ-पापा को समर्पित की है। पहली छपी क़िताब देखकर अच्छा लग रहा है। माँ-पापा के पैर छूकर आशीर्वाद लेने की इच्छा हो रही है।

Tuesday, July 9, 2013

फ़्यूल ज़िल्ट कॉन्फरेंस २०१३

फ़्यूल प्रोजेक्ट को करीब पाँच साल पहले मैंने शुरू किया था। पाँच साल के होने की खुशी के साथ एक बड़ी खुशी की बात है कि भाषा तकनीक के विभिन्न मुद्दों पर फ़्यूल ज़िल्ट कॉन्फरेंस का आयोजन रेड हैट और सी-डैक ज़िस्ट मिलकर कर रही है। इसमें g10n, i18n, l10n और ट्रांशलेशन से जुड़े मुद्दे पर चर्चा होगी। बतौर तकनीकी शब्दावली फ़्यूल प्रोजेक्ट के द्वारा समुदाय समर्थित और मूल्यांकित शब्दावली विभिन्न भाषा समुदाय के साथ ही कई संगठनों द्वारा मानक के तौर पर मानी जा रही है। ज्ञातव्य है कि इस प्रोजेक्ट की शुरुआत रेड हैट के द्वारा की गई थी और सी-डैक, विकिपीडिया, महाराष्ट्र सरकार समेत कई संगठनों ने इसके विकास में काफी सहयोग दिया है। फ़्यूल प्रोजेक्ट भारत सरकार के लोकलाइजेशन गाइडलाइन में बतौर संदर्भ है। इ-गवर्नेंस भारत सरकार के लोकलाइजेशन बेस्ट प्रैक्टिस गाइड में इसे स्थान मिला है। इन सारी सफलताओं के बीच हमने काफी कुछ सीखा है और हम चाहते हैं कि और भी इसका विकास हो। फ़्यूल ज़िल्ट कॉन्फरेंस २०१३ शायद इस दिशा में एक कदम होगा...हमें सीखने के लिए और दुनिया के सामने अपने मानकीकृत कार्यों को रखने के लिए जिसका विकास साझा तौर पर हुआ है जिसमें सबकी भागीदारी है। फ़्यूल ज़िल्ट कॉन्फरेंस २०१३ के लिए कॉल फॉर पेपर्स और शिरकत की खिड़की खोल दी गई है। इसे रेड हैट और सी-डैक द्वारा सम्मिलित रूप से आयोजित किया जा रहा है। अधिक जानकारी के लिए यहाँ देखें।

Wednesday, June 12, 2013

केवल भाषा नहीं है मैथिली, ज्ञान का समृद्ध स्रोत है यह – अजय कुमार झा

मोज़िल्ला फ़ायरफ़ॉक्स मैथिली कार्यशाला

२९ मई २०१३ को मोज़िल्ला फ़ायरफ़ॉक्स मैथिली कार्यशाला का आयोजन स्वैच्छिक रूप से मैथिली कंप्यूटर के लिए भाषा घर के अंतर्गत काम करनेवाले समुदाय द्वारा किया गया। मोज़िल्ला फ़ायरफ़ॉक्स मैथिली कार्यशाला एक पूर्ण दिवसीय कार्यशाला थी जहाँ इसके लिए काम करनेवाले समुदाय ने कुछ विशेषज्ञों के साथ फ़ायरफ़ॉक्स मैथिली से संबंधित मुद्दों और समस्याओं के बारे में विचार किया। इस कार्यशाला का उद्घटान ए.एन.सिन्हा इंस्टीट्यूट ऑफ सोसल स्टडीज के प्रो. अजय कुमार झा ने किया। इस कार्यशाला की मेजबानी सिद्धांत प्रकाशन ने अपने पुनाईचक स्थित कार्यालय में किया।

उद्धाटन वक्तव्य देते हुए प्रो. अजय कुमार झा ने कहा कि यह एक नया तरह का कार्य है। आज के लिए कंप्यूटर टाइपिंग पैड की तरह है। उन्होंने कहा कि केवल भाषा नहीं है बल्कि एक समृद्ध ज्ञान का स्रोत है। पंजाबी, तमिल, नेपाली की तरह यह भाषा दो देशों की भाषा है। उन्होंने कहा कि मैथिली क्षेत्र एक जातीय सौहाद्र का क्षेत्र है। उन्होंने बताया कि हमने यानी मैथिली भाषी क्षेत्र ने मुख्यधारा से अपने को इतना अधिक स्वेच्छा से जोड़ लिया कि हम अपने अस्तित्व को ही छोड़ दिया। यूनेस्को को मैथिली जैसी भाषा को आगे बढ़ाने के लिए आगे आना चाहिए। कंप्यूटर पर मैथिली का आना एक बड़ी उपलब्धि है और इस कार्य का प्रचार प्रसार होना चाहिए। उन्होंने सिद्धांत प्रकाशन के तत्वावधान में हुए इस काम की सराहना की।

इस कार्यशाला में फ़ायरफ़ॉक्स मैथिली ट्रांसलेथन का भी आयोजन किया गया जिसमें फ़ायरफ़ॉक्स मैथिली के लिए काम करनेवाली समुदाय ने फ़ायरफ़ॉक्स के नवीनतम रिलीज के लिए जरूरी बचे अनुवाद कार्य को भी पूरा किया। गौरतलब है कि फ़ायरफ़ॉक्स पहले से ही आधिकारिक रूप से मैथिली में रिलीज किया जा चुका है और सार्वजनिक रूप से निःशुल्क उपयोग के लिए उपलब्ध है। इसके लिए काम कर रहे लोगों ने फ़ायरफ़ॉक्स की मैथिली में उपलब्धता के प्रचार प्रसार के लिए काम करने पर जोर दिया। यह महसूस किया गया कि फ़ायरफ़ॉक्स की मैथिली में मौजूदगी की जानकारी बड़े जन-समुदाय को नहीं है। इसके लिए उपस्थित लोगों ने अनुवाद के लिए जरूरी भाषायी संसाधन, मसलन ट्रांसलेशन स्टाइल गाइड, की उपलब्धता को बढ़ाए जाने पर जोर दिया ताकि अनुवाद की गुणवत्ता में सतत सुधार किया जा सके। इस प्रकार के आयोजन की आवृति बढ़ाए जाने पर कार्यक्रम में जोर दिया गया जिसमें फ़ायरफ़ॉक्स के साथ ही समग्र मैथिली कंप्यूटर की बेहतरी के लिए काम किया जा सके। 


जय प्रकाश, मनोज कुमार, प्रभास रंजन, ब्रजराज कुमार, राकेश कुमार, प्रतिभा कुमारी, निवेदिता कुमारी और हृदयानंद झा ने कार्यशाला में भाग लिया और अपना विचार व्यक्त किया.  इस कार्यशाला की समाप्ति राकेश रोशन के धन्यवाद ज्ञापन से हुई।