अभी हाल में ही ब्लॉग पर मंहगाई पर बहस चली थी...और इधर नागार्जुन को फिर से पढ़ रहा था तो लगा कि यह कविता आपसे साझा करूं. वैद्यनाथ मिश्र यात्री यानी बाबा नागार्जुन की सारी कविताएं साहस की कविताएं हैं. और यह भी अपवाद नहीं हैं. लीजिए साहस से साक्षात्कार कीजिए...
किसान
उठह भाइ किसान!
अपना दुक्ख अपने नहि बुझबह तँ के बुझतह आन
आबह तों सबतरि फहराबह लाले निशान
उठह भाइ किसान!
जमिन्दार पर जकर नजर छह, पूँजिपति दिश ध्यान
तकरा बुते कोना क' हेतइ गरिबहाक कल्यान
दिल्ली में नेहरू पटना मे सिरीकिसुन श्रीमान
गाल बजाबथि, भोग लगाबथि मेवा ओ मिस्टान
घोंघा गाँथि माला बनाओल, धएलक बक सन ध्यान
घर भरलक ओ धोधि बढ़ओलक कंङरेसिया बइमान
दिन दिन दुर्लभ अन्न, कंठ मे अटकि रहल छइ प्रान
एकमतिया ज नहि हेबह त भ जेबह हलकान
उठह भाइ किसान!
कविता मैथिली में है लेकिन आशा है कि इस भाषा से जो परिचित नहीं हैं उन्हें भी यह उतनी ही समझ में आएगी जितनी किसी मैथिली भाषी को आ सकती है. हमलोग इतने साहस से क्यों नहीं बोल पाते हैं, किसी गलत को गलत क्यों नहीं कह पाते हैं. हम ऐसी कविता क्यों नहीं कर पाते. कारण जाहिर है कि हममें साहस नहीं है और कविता करने के लिए साहस चाहिए. हम भाट बन सकते हैं चारण बन सकते हैं लेकिन कवि नहीं बन सकते हैं...कवि बस कहला सकते हैं. हम वास्तव में छोटे छोटे स्वार्थों के गुलाम हैं. इसलिए ऐसी कविता नहीं कर सकते हैं. अब देखिए कितने 'कवि' आज भी हैं लेकिन कितनी कविताएं इतनी हो पाती हैं. दिलो दिमाग पर पदवी, पुरस्कार व पैसे ने हमलोगों के कलम से पैनेपन को छीन लिया है. हम ब्लॉग तो लिखते हैं लेकिन हम देखते हैं यह कितने लोगों को खुश करेगी...कितने लोगों की पसंद बनेगी. आगे बढ़कर देखें, मैं आपकी पीठ थपथपाता हूँ आप मेरी थपथपाएं. इंटरनेट पर चिट्ठाकारी लगभग पूरी तरह से स्वतंत्र माध्यम है...न संपादक की कलम का डर, न प्रकाशक के छापने से मना करने का डर. हम ब्लॉग को भी कविता की तरह साहस की चीज बना सकते हैं हम ब्लॉग को साहस का ब्लॉग बना सकते हैं बशर्ते हम अपने लालच व कमीनेपन से इस माध्यम को दूर रखें.
Wednesday, April 30, 2008
Thursday, April 24, 2008
मटियानी : विलक्षण कथाकार व दयनीय विचारक - राजेंद्र यादव
"मटियानी उन कहानीकारों में हैं जिनके पास सबसे अधिक संख्या में, 10-12 की संख्या में ए-वन कहानियां हैं. प्रेमचंद सहित हम सब के पास 5-6 से ज्यादा टॉप की कहानियां नहीं हैं जो कहानी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विश्वस्तर पर खड़ी हो सके. मेरे पास 2-4, भारती और राकेश के पास दो चार होंगी. बाकी की सब एक मिनिमम स्टैंडर्ड हैं परंतु जिसे
आउटस्टैंडिंग कहानी कहते हैं वो नहीं है. उनके पास सबसे ज्यादा हैं. हमलोगों में सबसे ज्यादा प्रतिभाशाली आदमी.उनमें अनुभव की आग और तड़प है. हमलोग कहीं न कहीं बुकिश हो जाते हैं. वे जिंदगी से उठाई गई कहानियां लिखते थे."
- राजेंद्र यादव
वरिष्ठ कथाकार और 'हंस' के संपादक राजेंद्र यादव हिंदी के संभवतः सर्वाधिक चर्चित और साथ ही विवादास्पद लेखक हैं. शैलेश मटियानी से इनकी काफी घनिष्ठता भी रही परंतु साथ ही कटुता उत्पन्न कर देने वाली झड़पों की लंबी किश्तें भी संबंधों में जुड़ती रहीं. राजेंद्र यादव और शैलेश मटियानी के बीच लड़ाई मूलतः विचारधारात्मक स्तर पर रही. राजेंद्र यादव खुद उनकी कहानियों के भयंकर प्रशंसक रहे हैं. वे मटियानी को हिंदी का एक ऐसा अकेला कहानीकार मानते हैं जिनके पास सबसे ज्यादा विश्वस्तरीय कहानियां है, यहां तक कि प्रेमचंद से भी ज्यादा. विचारधारात्मक स्तर पर मटियानी के धुर विरोधी परंतु रचनात्मकता के स्तर पर घनघोर समर्थक राजेंद्र यादव से मटियानी पर बात करना मटियानी के कई पक्षों को खोलना है. शैलेश मटियानी की मृत्यु को बीते 24 अप्रैल को सात साल पूरे हो गए. करीब छह साल पहले मैंने राजेंद्र यादव के साथ मटियानी पर बातचीत की थी. पढ़िए कुछ अंश.
अत्यंत महत्वपूर्ण कथाकार होने के बावजूद शैलेश मटियानी के व्यक्तित्व में ऐसा क्या रहा जिसके कारण
उन्हें वह अपेक्षित सम्मान न मिल सका जिसके वो निस्संदेह हकदार थे?
देखो, दिक्कत यह है कि शैलेश मटियानी के व्यक्तित्व के दो पक्ष हैं- एक तो रचनाकार और दूसरा विचारक. जो इधर पिछले 10-15 वर्षों में बहुत सामने आता रहा वह उनका विचारक पक्ष है. हालांकि इस बीच में उन्होंने 'माता', 'अहिंसा' और 'अर्द्धांगिनी' जैसी अद्भुत कहानियां लिखीं. यानी ये हिंदी की सर्वश्रेष्ठ कहानियों में से एक है. 'अर्द्धांगिनी' को तो मैं एक बहुत बड़ा लैंडमार्क मानता हूं. लेकिन शोर उनका ज्यादा उनके विचारक के कारण रहा . शोर भी नहीं कहूंगा बल्कि वे अपने को ज्यादा प्रोजेक्ट करते रहे विचारक की तरह.
अब यहां एक दूसरा प्वाइंट है. हम सब जानते हैं कि उनकी शिक्षा नहीं हुई थी. मैट्रिक का इम्तहान वे नहीं दे पाए थे. पहाड़ की जो स्थितियां थीं उसमें उन्हें भागकर बंबई जाना पड़ा. बहुत ही विकट स्थितियां थीं. आर्थिक रूप से और मानसिक रूप से भी. बंबई में उन्हें बहुत विकट जीवन जीना पड़ा.यानी फुटपाथ पर उन्हें बहुत समय बिताना पड़ा. मुफ्त के लंगरों या मंदिरों में या जहां मुफ्त खाना मिलता था, उन लाइनों में वे लगे. वहां से इन स्थितियों में गुजरकर वे आये. उन्होंने खुद लिखा है कि जब आवारा बच्चों की तरह पुलिस वाले उन्हें पकड़कर ले जाते थे तो उन्हें बड़ा अच्छा लगता था कि सोने की जगह मिलेगी और खाना मिलेगा. उन संघर्षों से आये हुए वे आदमी थे जिसके पास शिक्षा का बड़ा सहारा न हो, जिसने अपनी लेखकीय प्रतिभा पर अपनी जिंदगी, जगह बनाई.
जिस वक्त वे एक ढाबे में लगभग एक वेटर का काम कर रहे थे- प्लेटें धोने और चाय लाने का- एक छोटे में ढाबे में, उस वक्त तक उनकी कहानियां 'धर्मयुग' में छपना शुरू हो गई थीं. कितनी बड़ी विडंबना है कि 'धर्मयुग' जैसे सर्वश्रेष्ठ अखबार में जिनकी कहानियां छपना शुरू हो गई हों वो एक छोटे से सड़क के किनारे बने ढाबे में चाय-पानी देने और प्लेट साफ करने का काम कर रहा हो. तो उन स्थितियों में निकलकर, जिसे कहते हैं, गोर्की ने जिसे कहा है, 'समाज की तलछट से आए हुए लोग', वे आये थे. गोर्की ने अपनी आत्मकथा में इसी जीवन को जिया था जिसका नाम रखा था 'मेरा विश्वविद्यालय'. कहते थे कि ये मेरे विश्वविद्यालय हैं यहां से मैंने ट्रेनिंग ली है. मटियानी का स्ट्रांंगेस्ट प्वाइंट ये है. अब धीरे धीरे उनको लगता गया कि वे एक विचारक भी हैं. देश विदेश के विचारकों को समझने का पढ़ने का उन्हें मौका नहीं मिला. अंग्रेजी नहीं जानते थे. लेकिन फिर भी वो अपने ढंग से एक विचारक थे. देश की समझ, राष्ट्र की समस्या, भाषा की समस्या पर वे हमेशा लिखते थे. क्योंकि बिना लिखे रह भी नहीं सकते थे या रह सकना संभव नहीं था, कुछ तो आर्थिक कारणों से.
एक आत्मविश्वास उनमें जबरदस्त था. आत्मविश्वास और साहस. दिक्कत यह थी कि वो हिंदुत्व के उस घेरे से बाहर नहीं निकल पाए. विचार भी अगर उन्हें करना है तो सिर्फ उस पर बात करेंगे. धर्मग्रंथ या किसी इसी तरह की चीज को अगर कोई मानता रहा है तो वे उसे दूसरे ढंग से मानने का आग्रह करेंगे. कहना चाहिए कि घेरा वही था उससे बाहर वे नहीं निकल पाए. कहना चाहिए कि वे हिंदुत्व के पक्षधर और व्याख्याता होकर रह गये. एक अलग तरह से . उनकी चुनौती थी कि ये आर. एस. एस. वाले, ये संत-महात्मा हैं, ये न धर्म समझते हैं न संस्कृति समझते हैं.जो समझना चाहिए उनकी व्याख्या वे खुद देते थे. ये लोग राष्ट्र, राष्ट्रभक्ति, न भाषा जानते हैं. हिंदी एक तरह से उनकी मजबूरी भी थी और उनका लक्ष्य भी था. भाषा की बात बहुत करते थे.
मैं कहूंगा कि एक तरह से एक रूढ़िवादी विचारक के रूप में उन्होंने अपने को प्रोजेक्ट किया. पिछले 10 वर्षों में उन्होंने खुलकर हिंदुत्व का समर्थन करना शुरू कर दिया. 'पांचजञ्य' जैसी पत्रिकाओं में वे लगातार लिखते थे. उससे एक दूरी बढ़ती गई.
मैं खुद यह मानता हूं कि वे एक अद्भुत और विलक्षण कहानीकार और बहुत दयनीय विचारक थे. उनके व्यक्तित्व का एक तरह से विघटन या कहना चाहिए 'डिवैल्यूशन' होने का सबसे बड़ा कारण है कि लोगों ने उनके उस पक्ष को भी भुला दिया जो उनका सबसे मजबूत पक्ष था.साहित्य की मुख्यधारा से उनके किनारे पर चले जाने का एक मात्र बड़ा कारण यह रहा.
24 अप्रैल को मटियानी जी की पहली पुण्य तिथि है. क्या कारण है कि हिंदी की साहित्यिक परिधि में मटियानी की पुण्य तिथि के बहाने भी कोई भी कोई आयोजन नहीं हो रहा है?
अगर एक आदमी किसी पार्टी या विचारधारा से प्रतिबद्ध है तो यह जरूरी नहीं कि लोग उनकी एनीवर्सरी आदि मनाएं. अगर नरेंद्र कोहली के साथ कुछ हो जाए तो हम उनके लिए क्यों गोष्ठी करेंगे. होंगे नरेंद्र कोहली उनके लिए बड़े लेखक परंतु जनवादी लेखक क्यों मनायेगा?
लेकिन यह ज्यादती है. क्योंकि शैलेश मटियानी रेणु से पहले आदमी हैं जिन्होंने बहुत सफलता पूर्वक आंचलिक भाषा व आंचलिक संस्कृति का प्रयोग किया. जब रेणु का कहीं पता नहीं था तब उनका 'बोरीवली से बोरीबंदर तक' जैसा उपन्यास आ चुका था. पहाड़ के जीवन पर उनकी अद्भुत कहानियां आ चुकी हैं जो वहां की जीवन और वहां की संस्कृति और भाषा निरूपित करती थी. कई और रचनाएं आ चुकी थीं. उनमें रेणु से कम शक्ति नहीं है.उनमें विविधता ज्यादा है. बहुत ज्यादा विविधता है, क्योंकि अपने अनुभव हैं भिन्न-भिन्न तरह के फुटपाथ से लेकर बड़े शहरों तरह तक .
बेटे की हत्या ने उनके जीवन में एक बहुत खास तरह का परिवर्तन पैदा किया और एक पराजय का भाव, प्रारब्ध और नियति के सामने समर्पण का भाव, और धर्म और ईश्वर से एक तरह से इससे निकालने के लिए प्रार्थना का भाव पैदा किया. अपने इस अवमूल्यन के लिए कहीं पर यानी अपने शक्तिशाली लेखन को मार्जिन पर फेंक देने के लिए वे खुद जिम्मेदार हैं, हमलोग नहीं. हालांकि मैं यह मानता हूं कि हमें उनके विचारपक्ष को एक तरफ डाल देना चाहिए.उसे अलग फेंक सकते हैं. लेकिन उनकी रचनात्मकता हमारे किसी भी बड़े से बड़े लेखक से कम नहीं है. वो बहुत महत्वपूर्ण लेखक हैं और उन पर चाहे हमलोग कुछ करें या न करें कम से कम यह स्वीकृति जरूर होनी चाहिए कि हमारे बीच एक इस तरह का लेखक है जो वास्तविक अर्थ में अपनी जमीन से जुड़ा था, मुहावरे में नहीं. जो 'अर्द्धांगिनी' जैसी कहानी लिख सकता है वह निश्चित रूप से ..... . . वन आफ द ग्रेटेस्ट राइटर आफ दिस कंट्री.
उनकी शुरू की कहानियों की कई लोगों, शिवप्रसाद सिंह आदि ने नकल की.'दो दुखों का एक सुख' यह भिखमंगों पर है, खाना नहीं मिलता है, उन्हीं के बीच प्रेम हो जाता है दो दुख मिलकर किस तरह से एक सुख में बदल जाते हैं. एक आत्मीय सुख. मैं तो बहुत सपाट ढंग से इस आइडिया को रख रहा हूं, उसने बहुत खूबसूरत ढंग से लिखा है. तो वे कहानियां तो याद रखने वाली कहानियां हैं. एक तरह से उनके उपेक्षित हो जाने का कारण उनका विचार के प्रति अतिरिक्त आग्रह है, जो निश्चित रूप से वर्णव्यवस्थावादी है, जो आउटडेटेड है , जो सामंती है.
आपने कहा कि उनके जो इस ढंग के विचार आ रहे थे वे पिछले पंद्रह सालों से आ रहे थे. क्या उससे पहले उन्हें भरपूर समर्थन मिला था अथवा नहीं?
वे हिंदी के एक महत्वपूर्ण लेखक माने जाते थे. वे बहुत ओजस्वी वक्ता थे. लेकिन उनके भीतर हमेशा यह कचोट बनी रही कि मुझमें जितनी प्रतिभा है जितना मैं महान चिंतन करता हंू उतनी मुझे रिकग्नीशन नहीं मिली. ये कष्ट उन्हें था. उसके लिए वे अनेक लोगों को जिम्मेदार मानते थे जिनमें से लेखकों के संगठनों को भी मानते थे.जिंदगीभर वे लेखक संगठनों को खासकर के वामपंथी प्रगतिशील विचारधारा के लेखक संगठनों गालियां देते रहे. वे ये कहते रहे कि ये चोरों के अड्डे हैं. ये बदमाशों का समूह है तो फिर इन संगठनों से क्या उम्मीद की जाए कि यही उनकी स्मृति में सभाएं करेंगे.
लेकिन यह एक व्यावहारिकता है और मैं इसका पक्ष नहीं ले रहा हूं. यह सही चीज है कि आप मुझे गालियां देते रहें तो ठीक है आप अच्छे लेखक होंगे लेकिन मेरे लिए कुछ नहीं हैं.
मटियानी को नागार्जुन ने भारत के सम्भावित गोर्की के रूप में देखा था. आपने कहा कि वे भारत के गोर्की होते-होते रह गए? इन दोनों स्थितियों तक आने का मुख्य कारण क्या रहा?
उनमें एक फांक पैदा हो गई. गोर्की में वो फांक नहीं है. गोर्की की रचनात्मकता और वैचारिकता में इतनी बड़ी दूरी नहीं है जितनी इनके बीच में है. वे सोचते एक तरह से थे और लिखते दूसरी तरह से थे. ये फांक लगभग वही है जो निर्मल वर्मा में दिखाई देती है. विचारों के रूप में वे शुद्ध हिन्दूवादी हैं, शुद्ध आध्यात्म वगैरह से जुड़े.अभी निर्मल ने जो कुछ कहा गुजरात वगैरह की स्थिति के बारे में, अप्रत्यक्ष रूप से यह सवाल था कि उस परिवेश से आप कहां तक प्रभावित हैं तो उन्होंने लगभग तरह-तरह की भाषाओं में वह कहा जो हमारे संत लोग कहते रहे हैं कि ये तो माया है. यह बाहरी दुनिया है. इस भ्रम में तो आदमी को नहीं रहना चाहिए.मनुष्य का वास्तविक क्षेत्र तो आत्मा है. उसे इसी का अनुसंधान करना चाहिए, लगभग यही बात कही अपनी आधुनिक भाषा में. दूसरी वे जिस भारतीयता की बात करते हैं उस भारतीयता का कहीं कोई पता उनके रचनात्मक लेखन में नहीं है. सिर्फ कुछ कर्मकांड हैं, कुछ अंधविश्वास हैं, तो वह भी उनके 'अंतिम अरण्य' उपन्यास में. कहीं कोई भारतीयता का जि नहीं है. एक कोलोनियल पास्ट है, गिरजे हैं, चर्चे हैं, कब्रिस्तान हैं, भुतहे खंडहर हैं, एकांत हैं, पुराने मकान हैं, बूढ़े लोग हैं, अपने में कैद बिल्कुल एक पश्चिमी अकेले, आइसोलेटेड आदमी का, एक्ज़ाइल्ड आदमी की मानसिकता का चित्रण है.अब वे भारतीय संस्कृति की बात करते हैं.अब ये जो द्वैत है, जो अन्तर्विरोध है बहुत ज्यादा मुखर और विकट रूप में शैलेश मटियानी में दिखाई देता है. लगभग मेरी लड़ाइयां रही हैं उनके विचारक व्यक्तित्व से और भयंकर प्रशंसक रहा हूं मैं उनके रचनात्मक लेखन का. मैंने उनकी कहानियां छाप दीं और जिन लेखों को नहीं छापा उनको लेकर उन्होंने मुझे गालियां भी दी हैं.जिस स्तर पर वे लेखों में उतर जाते थे वह मुझे बर्दाश्त नहीं होता था.
धर्मवीर भारती के द्वारा 'धर्मयुग' में एक पर्चा छाप दिए जाने को लेकर मटियानी ने भारती पर मुकदमा कर दिया था. भारती की वह कौन सी व्यक्तिगत रंजिश थी जिसको लेकर 'धर्मयुग' में एक मामूली पर्चे को इतनी तरजीह दी गई थी.
मटियानी उस समय इंदिरा गांधी की इमरजेंसी के खिलाफ थे. धर्मवीर भारती आदि उनके समर्थक थे. बाद में जो पार्टी बने- जगदीश पीयूष, रवीन्द्र कालिया-ये सारे लोग.रवीन्द्र कालिया तो उस समय संजय ंसंह के दोस्त थे जो बाद में जनता पार्टी में आ गए थे. तो एक तरह से एक खुंदक थी कि यह आदमी क्यों इतना खुलकर बोलता है. मैं उस समय इमरजेंसी या ऐसी किसी एटीट्यूड के खिलाफ था जिनका समर्थन भारती कर रहे थे जो मेरी समझ में नहीं आ रहा था. पता ही होगा कि मसला क्या था. संजय गांधी मलिक मुहम्मद जायसी की समाधि पर फूल चढ़ा रहे हैं.एक दूसरे फोटो में शैलेश मटियानी भी जायसी की समाधि पर फूल चढ़ा रहे हैं. दोनों फोटो को एक पर्चे पर छापकर नीचे लिख दिया गया 'बादशाह तुम जगत के जग तोम्हार मोहताज'. ये अलाउद्दीन खिलजी के लिए लिखा गया था. लगता ये था कि ये सारे लेखक संजय गांधी की प्रशस्ति बोल रहे हैं कि 'बादशाह तुम जगत के और जग तोम्हार मोहताज.'
मटियानी का कहना था कि ये दो अलग अलग समय के चित्र हैं. इसके बीच में डेढ़ वर्ष का अंतर है. संजय गांधी के साथ कुछ लेखक फूल चढ़ा रहे हैं और कुछ लेखक अलग चित्र में जायसी की समाधि पर फूल चढ़ा रहे हैं. दोनों को एकसाथ देकर यह भ्रम पैदा किया है कि ये दोनों एक ही समय के चित्र हैं. और फिर इसको भारती ने समर्थन दिया था. उनका आग्रह सिर्फ यह था कि भारती इसको लेकर क्षमा मांगें. व्यक्तिगत रूप से नहीं, लिखित रूप से. भारती ने नहीं माना. रजिस्टर्ड नोटिस दिए, लोगों से कहलाया और अंत में जाकर मुकद्मा कर दिया और मुकदमा कर दिया तो टाइम्स आफ इंडिया वर्सेज़ शैलेश मटियानी हो गया.
आपने पिछले साल उनके निधनोपरांत कहा था कि वे एकमात्र ऐसे लेखक हैं जिनकी 10-12 कहानियां विश्वस्तरीय हैं. क्या वे सचमुच एकमात्र ऐसे लेखक हैं?
एकमात्र नहीं, वे उन कहानीकारों में हैं जिनके पास सबसे अधिक संख्या में 10-12 की संख्या में ए-वन कहानियां हैं. प्रेमचंद सहित हम सब के पास 5-6 से ज्यादा टॉप की कहानियां नहीं हैं. जो कहानी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विश्वस्तर पर खड़ी हो सके. मेरे पास 2-4, भारती और राकेश के पास दो चार होंगी. बाकी की सभी एक मिनिमम स्टैंडर्ड हैं परंतु जिसे आउटस्टैंडिंग कहानी कहते हैं वो नहीं है. उनके पास सबसे ज्यादा हैं. हमलोगों में सबसे ज्यादा प्रतिभाशाली आदमी.उनमें अनुभव की आग और तड़प है. हमलोग कहीं न कहीं बुकिश हो जाते हैं. ये जिंदगी से उठाई गई कहानियां लिखते थे.
उनका एक अद्भुत उपन्यास है 'गोपुली गफरन'. सुना है न . गोपुली पहाड़ की एक ब्राह्मण महिला है. धीरे-धीरे वह भगा कर मैदान में लायी जाती है और गफूरन बना ही जाती है. उसको जितनी आत्मीयता, संवेदना और अंडरस्टैंडिंग के साथ उन्होंने लिखा है, लेकिन बाद में किस तरह से मुसलमानों के खिलाफ लिखने लगे. 'इब्बू मलंग' उन्हीं की कहानी है. उन लोगों को जितनी भीतरी अंडरस्टैंडिंग, सिम्पैथी दी है वो वैचारिकता में उनका नाश करने वाली है.
उनकी कहानी की दुनिया मार्जिनलाइज़्ड की दुनिया है. गरीबों की दुनिया है. वह खुद जाति व्यवस्था से पीड़ित रहे. पहाड़ से भगा दिए गए. विचार की दुनिया में वे उसी का समर्थन करते हैं. ये भगाए गए थे इसलिए कि ये प्रॉपर ढंग से क्षत्रिय भी नहीं थे. कसाई थे. इनके परिवार में कसाई का काम होता था. यह उनको तकलीफ देता था. वहां के ब्राह्मणों ने मिलकर भगाया था. एक ब्राह्मण लड़की से प्रेम हो गया था जिस कारण उन्हें अल्मोड़ा छोड़ना पड़ा. उनकी जान को खतरा हो गया था.वो लड़की इनके अगेंस्ट हो गई थी.जो लड़की इनसे प्रेग्नेंट हो गई थी वही खुद इनके अगेंस्ट हो गई. उसने कहा था कि यह बहकाकर-भगाकर मैदान में उसे बेचना चाहता था. तो जाति व्यवस्था के कारण उन्होंने इतनी यातना बर्दाश्त की.बाद में वेे इसी वर्णव्यवस्था का समर्थन करने लगे. वे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद ने बारे में बोलते हैं जो वर्णव्यवस्था का दूसरा रूप है. मेरी लड़ाई इसी बात से थी कि आप अपनी जिंदगी के अनुभवों से कहानी तो लिख सकते हैं परंतु सोच कुछ नहीं सकते. अक्सर उनसे मेरी भयंकर लड़ाइयां हैं. चिट्ठियां भी हैं. उनके मेरे पत्रों की ढाई-तीन सौ पृष्ठों की एक किताब है. और भी इतनी और चिट्ठियां रखी हैं कि एक दो किताबें और बन जाएं.
अंत में वे पागल हो गए. छह सात बार ऐसा भी हुआ कि उन्हें जंजीरों में पकड़कर बांधकर रखना पड़ता था. लगभग यही स्थिति स्वदेश दीपक की थी.सात साल पागल रहा.इलाज हुआ उसका. उसने 'कोर्ट मार्शल' लिखा है. अभी उसने पागलपन की स्थिति पर अद्भुत संस्मरण लिखा है जिसमें से एक अभी 'कथादेश' में छपा था. यानी उस पीरियड को भी कैसे रचनात्मक ढंग से इस्तेमाल किया जा सकता है यह स्वदेश दीपक का अनुभव बताता है.
निराला, भुवनेश्वर, मुक्तिबोध और अब मटियानी क्या इन सबके साथ जो कुछ हुआ उसको देखकर ऐसा नहीं लगता कि एक लेखक सहायता कोष बनाया जाना चाहिए ताकि उन लेखकों को अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए राजनेताओं-अफसरों की चिरौरी न करनी पड़ी?
शुरू में मेरा एक कहानी संग्रह निकला था- 'देवताओं की मूर्ति' और अभी संस्मरण की किताब आई है- 'वे देवता नहीं हैं'. दोनों में अद्भुत साम्य है. उसमें भी एक ऐसे लेखक का चित्रण है जो देवतापन से आक्रांत है कि वह सबसे अलग है, महान है आदि. हम लोग एक तरह से उन्हें देवताओं की मूर्तियों की तरह स्थापित कर देते हैं.
इन सभी की ट्रेजेडी यह है कि जितने प्रतिभाशाली ये थे इतनी मान्यता उन्हें नहीं मिली, उतनी स्वीकृति नहीं मिली. उससे भी ज्यादा तकलीफ इस बात की है कि जिनमें कम प्रतिभा थी वो लोग अपने संपर्कों से, साधनों से, तिकड़मों से टॉप पर चले गए. ये एक स्थिति है जिससे मेरा ख्याल है मुक्ति संभव नहीं है. उपेक्षा का क्षेत्र और अनपेक्षित लोगों का जरूरत से ज्यादा अवसरों का दोहन. भुवनेश्वर जैसा ब्रिलियंट राइटर जो 'कारवां', 'भेड़िये' जैसी कहानी लिख सकता था. निराला, मटियानी के साथ भी यही हुआ.
मेरा प्रश्न था आर्थिक सहायता कोष के ढंग का कुछ बनाया जा सकता है.
आर्थिक सहायता भी जरूरी है परंतु उनकी समस्या आर्थिक नहीं है. आर्थिक सहायता का महत्त्व है या आर्थिक सहायता भी होनी ही चाहिए. मुझे नहीं मालूम कि ऐसा मेरे साथ होता तो क्या होता. लेकिन हमलोगों को इन सभी पर सहानुभूति से सोचना चाहिए. ये वाकई अनचैरिटेबल और अनसिम्पैथेटिक होगा कि अपनी इन स्थितियों के लिए वे खुद जिम्मेदार थे.
इसी संबंध में उनके द्वारा गोविंद मिश्र को लिखे पत्र का एक अंश याद आता है कि खासकर वामपंथी आलोचक लेखकों ने उनके लिए वे सारे दरवाजे बंदकर दिए जहां से उन्हें आर्थिक सहायता मिल सकती थी.
वे लोग उनकी सहायता कैसे कर सकते थे. साहित्य अकादेमी में उनकी स्मृति में गोष्ठी के लिए हॉल मांगा गया. उन्होंने यह कहते हुए हॉल देेने से मना कर दिया कि जो व्यक्ति जीवन भर अकादेमी की आलोचना करता रहा उसके लिए वे कैसे हाल दे सकते हैं. इसमें कहां से वामपंथ आ गया. चूंकि वामपंथी उनके विचारों को मान्यता नहीं देते थे इसलिए उन्हें शिकायत थी. इसलिए उन्हें लगता था कि जो उनका विरोध कर रहा है वह वामपंथी है. भारती कौन से वांमपंथी थे? जगदीश पीयूष कौन से वामपंथी थे? गलत ढंग से चीजों को अपने लिए बिन्दु कर लेने की एक मानसिकता एक पैरानोइया हो जाता है. भारती का तो दुश्मन भी नहीं कह सकता कि भारती वामपंथी थे और सबसे बड़ी सुप्रीम कोर्ट तक चलने वाली लड़ाई भारती से ही हुई.
आपको मटियानी की एक सबसे अच्छी कहानी और एक सबसे अच्छा उपन्यास चुनने को कहा जाए तो आप कौन सा चुनेंगे.
अगर मुझसे पूछा जाए तो मैं उनकी सबसे अच्छी कहानी 'अर्द्धांगिनी' को मानूंगा. उपन्यासों में तय करना थोड़ा सा मुश्किल है फिर भी 'बोरीवली से बोरीबंदर तक'.
'अर्धांगिनी' में स्त्री पुरूष के बीच का जो डेलिकेट रिलेशन है उसे उन्होंने बहुत ही लिरिकल ढंग से रखा है. बंबई के फुटपाथों की जिंदगी को 'बोरीवली से बोरीबंदर तक' में लिखा है जिसके लिए बाद में 'मुरदाघर' के रचनाकार जगदंबा प्रसाद दीक्षित मशहूर हुए. बाद में वे भी बीजेपी में चले गए. सारी वैचारिक घोषणाओं के बावजूद आज भी वे माले का अपने को कहते हैं परंतु समर्थन वे हिंदुत्व का, शिवसेना का करते हैं.
आउटस्टैंडिंग कहानी कहते हैं वो नहीं है. उनके पास सबसे ज्यादा हैं. हमलोगों में सबसे ज्यादा प्रतिभाशाली आदमी.उनमें अनुभव की आग और तड़प है. हमलोग कहीं न कहीं बुकिश हो जाते हैं. वे जिंदगी से उठाई गई कहानियां लिखते थे."
- राजेंद्र यादव
वरिष्ठ कथाकार और 'हंस' के संपादक राजेंद्र यादव हिंदी के संभवतः सर्वाधिक चर्चित और साथ ही विवादास्पद लेखक हैं. शैलेश मटियानी से इनकी काफी घनिष्ठता भी रही परंतु साथ ही कटुता उत्पन्न कर देने वाली झड़पों की लंबी किश्तें भी संबंधों में जुड़ती रहीं. राजेंद्र यादव और शैलेश मटियानी के बीच लड़ाई मूलतः विचारधारात्मक स्तर पर रही. राजेंद्र यादव खुद उनकी कहानियों के भयंकर प्रशंसक रहे हैं. वे मटियानी को हिंदी का एक ऐसा अकेला कहानीकार मानते हैं जिनके पास सबसे ज्यादा विश्वस्तरीय कहानियां है, यहां तक कि प्रेमचंद से भी ज्यादा. विचारधारात्मक स्तर पर मटियानी के धुर विरोधी परंतु रचनात्मकता के स्तर पर घनघोर समर्थक राजेंद्र यादव से मटियानी पर बात करना मटियानी के कई पक्षों को खोलना है. शैलेश मटियानी की मृत्यु को बीते 24 अप्रैल को सात साल पूरे हो गए. करीब छह साल पहले मैंने राजेंद्र यादव के साथ मटियानी पर बातचीत की थी. पढ़िए कुछ अंश.
अत्यंत महत्वपूर्ण कथाकार होने के बावजूद शैलेश मटियानी के व्यक्तित्व में ऐसा क्या रहा जिसके कारण
उन्हें वह अपेक्षित सम्मान न मिल सका जिसके वो निस्संदेह हकदार थे?
देखो, दिक्कत यह है कि शैलेश मटियानी के व्यक्तित्व के दो पक्ष हैं- एक तो रचनाकार और दूसरा विचारक. जो इधर पिछले 10-15 वर्षों में बहुत सामने आता रहा वह उनका विचारक पक्ष है. हालांकि इस बीच में उन्होंने 'माता', 'अहिंसा' और 'अर्द्धांगिनी' जैसी अद्भुत कहानियां लिखीं. यानी ये हिंदी की सर्वश्रेष्ठ कहानियों में से एक है. 'अर्द्धांगिनी' को तो मैं एक बहुत बड़ा लैंडमार्क मानता हूं. लेकिन शोर उनका ज्यादा उनके विचारक के कारण रहा . शोर भी नहीं कहूंगा बल्कि वे अपने को ज्यादा प्रोजेक्ट करते रहे विचारक की तरह.
अब यहां एक दूसरा प्वाइंट है. हम सब जानते हैं कि उनकी शिक्षा नहीं हुई थी. मैट्रिक का इम्तहान वे नहीं दे पाए थे. पहाड़ की जो स्थितियां थीं उसमें उन्हें भागकर बंबई जाना पड़ा. बहुत ही विकट स्थितियां थीं. आर्थिक रूप से और मानसिक रूप से भी. बंबई में उन्हें बहुत विकट जीवन जीना पड़ा.यानी फुटपाथ पर उन्हें बहुत समय बिताना पड़ा. मुफ्त के लंगरों या मंदिरों में या जहां मुफ्त खाना मिलता था, उन लाइनों में वे लगे. वहां से इन स्थितियों में गुजरकर वे आये. उन्होंने खुद लिखा है कि जब आवारा बच्चों की तरह पुलिस वाले उन्हें पकड़कर ले जाते थे तो उन्हें बड़ा अच्छा लगता था कि सोने की जगह मिलेगी और खाना मिलेगा. उन संघर्षों से आये हुए वे आदमी थे जिसके पास शिक्षा का बड़ा सहारा न हो, जिसने अपनी लेखकीय प्रतिभा पर अपनी जिंदगी, जगह बनाई.
जिस वक्त वे एक ढाबे में लगभग एक वेटर का काम कर रहे थे- प्लेटें धोने और चाय लाने का- एक छोटे में ढाबे में, उस वक्त तक उनकी कहानियां 'धर्मयुग' में छपना शुरू हो गई थीं. कितनी बड़ी विडंबना है कि 'धर्मयुग' जैसे सर्वश्रेष्ठ अखबार में जिनकी कहानियां छपना शुरू हो गई हों वो एक छोटे से सड़क के किनारे बने ढाबे में चाय-पानी देने और प्लेट साफ करने का काम कर रहा हो. तो उन स्थितियों में निकलकर, जिसे कहते हैं, गोर्की ने जिसे कहा है, 'समाज की तलछट से आए हुए लोग', वे आये थे. गोर्की ने अपनी आत्मकथा में इसी जीवन को जिया था जिसका नाम रखा था 'मेरा विश्वविद्यालय'. कहते थे कि ये मेरे विश्वविद्यालय हैं यहां से मैंने ट्रेनिंग ली है. मटियानी का स्ट्रांंगेस्ट प्वाइंट ये है. अब धीरे धीरे उनको लगता गया कि वे एक विचारक भी हैं. देश विदेश के विचारकों को समझने का पढ़ने का उन्हें मौका नहीं मिला. अंग्रेजी नहीं जानते थे. लेकिन फिर भी वो अपने ढंग से एक विचारक थे. देश की समझ, राष्ट्र की समस्या, भाषा की समस्या पर वे हमेशा लिखते थे. क्योंकि बिना लिखे रह भी नहीं सकते थे या रह सकना संभव नहीं था, कुछ तो आर्थिक कारणों से.
एक आत्मविश्वास उनमें जबरदस्त था. आत्मविश्वास और साहस. दिक्कत यह थी कि वो हिंदुत्व के उस घेरे से बाहर नहीं निकल पाए. विचार भी अगर उन्हें करना है तो सिर्फ उस पर बात करेंगे. धर्मग्रंथ या किसी इसी तरह की चीज को अगर कोई मानता रहा है तो वे उसे दूसरे ढंग से मानने का आग्रह करेंगे. कहना चाहिए कि घेरा वही था उससे बाहर वे नहीं निकल पाए. कहना चाहिए कि वे हिंदुत्व के पक्षधर और व्याख्याता होकर रह गये. एक अलग तरह से . उनकी चुनौती थी कि ये आर. एस. एस. वाले, ये संत-महात्मा हैं, ये न धर्म समझते हैं न संस्कृति समझते हैं.जो समझना चाहिए उनकी व्याख्या वे खुद देते थे. ये लोग राष्ट्र, राष्ट्रभक्ति, न भाषा जानते हैं. हिंदी एक तरह से उनकी मजबूरी भी थी और उनका लक्ष्य भी था. भाषा की बात बहुत करते थे.
मैं कहूंगा कि एक तरह से एक रूढ़िवादी विचारक के रूप में उन्होंने अपने को प्रोजेक्ट किया. पिछले 10 वर्षों में उन्होंने खुलकर हिंदुत्व का समर्थन करना शुरू कर दिया. 'पांचजञ्य' जैसी पत्रिकाओं में वे लगातार लिखते थे. उससे एक दूरी बढ़ती गई.
मैं खुद यह मानता हूं कि वे एक अद्भुत और विलक्षण कहानीकार और बहुत दयनीय विचारक थे. उनके व्यक्तित्व का एक तरह से विघटन या कहना चाहिए 'डिवैल्यूशन' होने का सबसे बड़ा कारण है कि लोगों ने उनके उस पक्ष को भी भुला दिया जो उनका सबसे मजबूत पक्ष था.साहित्य की मुख्यधारा से उनके किनारे पर चले जाने का एक मात्र बड़ा कारण यह रहा.
24 अप्रैल को मटियानी जी की पहली पुण्य तिथि है. क्या कारण है कि हिंदी की साहित्यिक परिधि में मटियानी की पुण्य तिथि के बहाने भी कोई भी कोई आयोजन नहीं हो रहा है?
अगर एक आदमी किसी पार्टी या विचारधारा से प्रतिबद्ध है तो यह जरूरी नहीं कि लोग उनकी एनीवर्सरी आदि मनाएं. अगर नरेंद्र कोहली के साथ कुछ हो जाए तो हम उनके लिए क्यों गोष्ठी करेंगे. होंगे नरेंद्र कोहली उनके लिए बड़े लेखक परंतु जनवादी लेखक क्यों मनायेगा?
लेकिन यह ज्यादती है. क्योंकि शैलेश मटियानी रेणु से पहले आदमी हैं जिन्होंने बहुत सफलता पूर्वक आंचलिक भाषा व आंचलिक संस्कृति का प्रयोग किया. जब रेणु का कहीं पता नहीं था तब उनका 'बोरीवली से बोरीबंदर तक' जैसा उपन्यास आ चुका था. पहाड़ के जीवन पर उनकी अद्भुत कहानियां आ चुकी हैं जो वहां की जीवन और वहां की संस्कृति और भाषा निरूपित करती थी. कई और रचनाएं आ चुकी थीं. उनमें रेणु से कम शक्ति नहीं है.उनमें विविधता ज्यादा है. बहुत ज्यादा विविधता है, क्योंकि अपने अनुभव हैं भिन्न-भिन्न तरह के फुटपाथ से लेकर बड़े शहरों तरह तक .
बेटे की हत्या ने उनके जीवन में एक बहुत खास तरह का परिवर्तन पैदा किया और एक पराजय का भाव, प्रारब्ध और नियति के सामने समर्पण का भाव, और धर्म और ईश्वर से एक तरह से इससे निकालने के लिए प्रार्थना का भाव पैदा किया. अपने इस अवमूल्यन के लिए कहीं पर यानी अपने शक्तिशाली लेखन को मार्जिन पर फेंक देने के लिए वे खुद जिम्मेदार हैं, हमलोग नहीं. हालांकि मैं यह मानता हूं कि हमें उनके विचारपक्ष को एक तरफ डाल देना चाहिए.उसे अलग फेंक सकते हैं. लेकिन उनकी रचनात्मकता हमारे किसी भी बड़े से बड़े लेखक से कम नहीं है. वो बहुत महत्वपूर्ण लेखक हैं और उन पर चाहे हमलोग कुछ करें या न करें कम से कम यह स्वीकृति जरूर होनी चाहिए कि हमारे बीच एक इस तरह का लेखक है जो वास्तविक अर्थ में अपनी जमीन से जुड़ा था, मुहावरे में नहीं. जो 'अर्द्धांगिनी' जैसी कहानी लिख सकता है वह निश्चित रूप से ..... . . वन आफ द ग्रेटेस्ट राइटर आफ दिस कंट्री.
उनकी शुरू की कहानियों की कई लोगों, शिवप्रसाद सिंह आदि ने नकल की.'दो दुखों का एक सुख' यह भिखमंगों पर है, खाना नहीं मिलता है, उन्हीं के बीच प्रेम हो जाता है दो दुख मिलकर किस तरह से एक सुख में बदल जाते हैं. एक आत्मीय सुख. मैं तो बहुत सपाट ढंग से इस आइडिया को रख रहा हूं, उसने बहुत खूबसूरत ढंग से लिखा है. तो वे कहानियां तो याद रखने वाली कहानियां हैं. एक तरह से उनके उपेक्षित हो जाने का कारण उनका विचार के प्रति अतिरिक्त आग्रह है, जो निश्चित रूप से वर्णव्यवस्थावादी है, जो आउटडेटेड है , जो सामंती है.
आपने कहा कि उनके जो इस ढंग के विचार आ रहे थे वे पिछले पंद्रह सालों से आ रहे थे. क्या उससे पहले उन्हें भरपूर समर्थन मिला था अथवा नहीं?
वे हिंदी के एक महत्वपूर्ण लेखक माने जाते थे. वे बहुत ओजस्वी वक्ता थे. लेकिन उनके भीतर हमेशा यह कचोट बनी रही कि मुझमें जितनी प्रतिभा है जितना मैं महान चिंतन करता हंू उतनी मुझे रिकग्नीशन नहीं मिली. ये कष्ट उन्हें था. उसके लिए वे अनेक लोगों को जिम्मेदार मानते थे जिनमें से लेखकों के संगठनों को भी मानते थे.जिंदगीभर वे लेखक संगठनों को खासकर के वामपंथी प्रगतिशील विचारधारा के लेखक संगठनों गालियां देते रहे. वे ये कहते रहे कि ये चोरों के अड्डे हैं. ये बदमाशों का समूह है तो फिर इन संगठनों से क्या उम्मीद की जाए कि यही उनकी स्मृति में सभाएं करेंगे.
लेकिन यह एक व्यावहारिकता है और मैं इसका पक्ष नहीं ले रहा हूं. यह सही चीज है कि आप मुझे गालियां देते रहें तो ठीक है आप अच्छे लेखक होंगे लेकिन मेरे लिए कुछ नहीं हैं.
मटियानी को नागार्जुन ने भारत के सम्भावित गोर्की के रूप में देखा था. आपने कहा कि वे भारत के गोर्की होते-होते रह गए? इन दोनों स्थितियों तक आने का मुख्य कारण क्या रहा?
उनमें एक फांक पैदा हो गई. गोर्की में वो फांक नहीं है. गोर्की की रचनात्मकता और वैचारिकता में इतनी बड़ी दूरी नहीं है जितनी इनके बीच में है. वे सोचते एक तरह से थे और लिखते दूसरी तरह से थे. ये फांक लगभग वही है जो निर्मल वर्मा में दिखाई देती है. विचारों के रूप में वे शुद्ध हिन्दूवादी हैं, शुद्ध आध्यात्म वगैरह से जुड़े.अभी निर्मल ने जो कुछ कहा गुजरात वगैरह की स्थिति के बारे में, अप्रत्यक्ष रूप से यह सवाल था कि उस परिवेश से आप कहां तक प्रभावित हैं तो उन्होंने लगभग तरह-तरह की भाषाओं में वह कहा जो हमारे संत लोग कहते रहे हैं कि ये तो माया है. यह बाहरी दुनिया है. इस भ्रम में तो आदमी को नहीं रहना चाहिए.मनुष्य का वास्तविक क्षेत्र तो आत्मा है. उसे इसी का अनुसंधान करना चाहिए, लगभग यही बात कही अपनी आधुनिक भाषा में. दूसरी वे जिस भारतीयता की बात करते हैं उस भारतीयता का कहीं कोई पता उनके रचनात्मक लेखन में नहीं है. सिर्फ कुछ कर्मकांड हैं, कुछ अंधविश्वास हैं, तो वह भी उनके 'अंतिम अरण्य' उपन्यास में. कहीं कोई भारतीयता का जि नहीं है. एक कोलोनियल पास्ट है, गिरजे हैं, चर्चे हैं, कब्रिस्तान हैं, भुतहे खंडहर हैं, एकांत हैं, पुराने मकान हैं, बूढ़े लोग हैं, अपने में कैद बिल्कुल एक पश्चिमी अकेले, आइसोलेटेड आदमी का, एक्ज़ाइल्ड आदमी की मानसिकता का चित्रण है.अब वे भारतीय संस्कृति की बात करते हैं.अब ये जो द्वैत है, जो अन्तर्विरोध है बहुत ज्यादा मुखर और विकट रूप में शैलेश मटियानी में दिखाई देता है. लगभग मेरी लड़ाइयां रही हैं उनके विचारक व्यक्तित्व से और भयंकर प्रशंसक रहा हूं मैं उनके रचनात्मक लेखन का. मैंने उनकी कहानियां छाप दीं और जिन लेखों को नहीं छापा उनको लेकर उन्होंने मुझे गालियां भी दी हैं.जिस स्तर पर वे लेखों में उतर जाते थे वह मुझे बर्दाश्त नहीं होता था.
धर्मवीर भारती के द्वारा 'धर्मयुग' में एक पर्चा छाप दिए जाने को लेकर मटियानी ने भारती पर मुकदमा कर दिया था. भारती की वह कौन सी व्यक्तिगत रंजिश थी जिसको लेकर 'धर्मयुग' में एक मामूली पर्चे को इतनी तरजीह दी गई थी.
मटियानी उस समय इंदिरा गांधी की इमरजेंसी के खिलाफ थे. धर्मवीर भारती आदि उनके समर्थक थे. बाद में जो पार्टी बने- जगदीश पीयूष, रवीन्द्र कालिया-ये सारे लोग.रवीन्द्र कालिया तो उस समय संजय ंसंह के दोस्त थे जो बाद में जनता पार्टी में आ गए थे. तो एक तरह से एक खुंदक थी कि यह आदमी क्यों इतना खुलकर बोलता है. मैं उस समय इमरजेंसी या ऐसी किसी एटीट्यूड के खिलाफ था जिनका समर्थन भारती कर रहे थे जो मेरी समझ में नहीं आ रहा था. पता ही होगा कि मसला क्या था. संजय गांधी मलिक मुहम्मद जायसी की समाधि पर फूल चढ़ा रहे हैं.एक दूसरे फोटो में शैलेश मटियानी भी जायसी की समाधि पर फूल चढ़ा रहे हैं. दोनों फोटो को एक पर्चे पर छापकर नीचे लिख दिया गया 'बादशाह तुम जगत के जग तोम्हार मोहताज'. ये अलाउद्दीन खिलजी के लिए लिखा गया था. लगता ये था कि ये सारे लेखक संजय गांधी की प्रशस्ति बोल रहे हैं कि 'बादशाह तुम जगत के और जग तोम्हार मोहताज.'
मटियानी का कहना था कि ये दो अलग अलग समय के चित्र हैं. इसके बीच में डेढ़ वर्ष का अंतर है. संजय गांधी के साथ कुछ लेखक फूल चढ़ा रहे हैं और कुछ लेखक अलग चित्र में जायसी की समाधि पर फूल चढ़ा रहे हैं. दोनों को एकसाथ देकर यह भ्रम पैदा किया है कि ये दोनों एक ही समय के चित्र हैं. और फिर इसको भारती ने समर्थन दिया था. उनका आग्रह सिर्फ यह था कि भारती इसको लेकर क्षमा मांगें. व्यक्तिगत रूप से नहीं, लिखित रूप से. भारती ने नहीं माना. रजिस्टर्ड नोटिस दिए, लोगों से कहलाया और अंत में जाकर मुकद्मा कर दिया और मुकदमा कर दिया तो टाइम्स आफ इंडिया वर्सेज़ शैलेश मटियानी हो गया.
आपने पिछले साल उनके निधनोपरांत कहा था कि वे एकमात्र ऐसे लेखक हैं जिनकी 10-12 कहानियां विश्वस्तरीय हैं. क्या वे सचमुच एकमात्र ऐसे लेखक हैं?
एकमात्र नहीं, वे उन कहानीकारों में हैं जिनके पास सबसे अधिक संख्या में 10-12 की संख्या में ए-वन कहानियां हैं. प्रेमचंद सहित हम सब के पास 5-6 से ज्यादा टॉप की कहानियां नहीं हैं. जो कहानी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विश्वस्तर पर खड़ी हो सके. मेरे पास 2-4, भारती और राकेश के पास दो चार होंगी. बाकी की सभी एक मिनिमम स्टैंडर्ड हैं परंतु जिसे आउटस्टैंडिंग कहानी कहते हैं वो नहीं है. उनके पास सबसे ज्यादा हैं. हमलोगों में सबसे ज्यादा प्रतिभाशाली आदमी.उनमें अनुभव की आग और तड़प है. हमलोग कहीं न कहीं बुकिश हो जाते हैं. ये जिंदगी से उठाई गई कहानियां लिखते थे.
उनका एक अद्भुत उपन्यास है 'गोपुली गफरन'. सुना है न . गोपुली पहाड़ की एक ब्राह्मण महिला है. धीरे-धीरे वह भगा कर मैदान में लायी जाती है और गफूरन बना ही जाती है. उसको जितनी आत्मीयता, संवेदना और अंडरस्टैंडिंग के साथ उन्होंने लिखा है, लेकिन बाद में किस तरह से मुसलमानों के खिलाफ लिखने लगे. 'इब्बू मलंग' उन्हीं की कहानी है. उन लोगों को जितनी भीतरी अंडरस्टैंडिंग, सिम्पैथी दी है वो वैचारिकता में उनका नाश करने वाली है.
उनकी कहानी की दुनिया मार्जिनलाइज़्ड की दुनिया है. गरीबों की दुनिया है. वह खुद जाति व्यवस्था से पीड़ित रहे. पहाड़ से भगा दिए गए. विचार की दुनिया में वे उसी का समर्थन करते हैं. ये भगाए गए थे इसलिए कि ये प्रॉपर ढंग से क्षत्रिय भी नहीं थे. कसाई थे. इनके परिवार में कसाई का काम होता था. यह उनको तकलीफ देता था. वहां के ब्राह्मणों ने मिलकर भगाया था. एक ब्राह्मण लड़की से प्रेम हो गया था जिस कारण उन्हें अल्मोड़ा छोड़ना पड़ा. उनकी जान को खतरा हो गया था.वो लड़की इनके अगेंस्ट हो गई थी.जो लड़की इनसे प्रेग्नेंट हो गई थी वही खुद इनके अगेंस्ट हो गई. उसने कहा था कि यह बहकाकर-भगाकर मैदान में उसे बेचना चाहता था. तो जाति व्यवस्था के कारण उन्होंने इतनी यातना बर्दाश्त की.बाद में वेे इसी वर्णव्यवस्था का समर्थन करने लगे. वे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद ने बारे में बोलते हैं जो वर्णव्यवस्था का दूसरा रूप है. मेरी लड़ाई इसी बात से थी कि आप अपनी जिंदगी के अनुभवों से कहानी तो लिख सकते हैं परंतु सोच कुछ नहीं सकते. अक्सर उनसे मेरी भयंकर लड़ाइयां हैं. चिट्ठियां भी हैं. उनके मेरे पत्रों की ढाई-तीन सौ पृष्ठों की एक किताब है. और भी इतनी और चिट्ठियां रखी हैं कि एक दो किताबें और बन जाएं.
अंत में वे पागल हो गए. छह सात बार ऐसा भी हुआ कि उन्हें जंजीरों में पकड़कर बांधकर रखना पड़ता था. लगभग यही स्थिति स्वदेश दीपक की थी.सात साल पागल रहा.इलाज हुआ उसका. उसने 'कोर्ट मार्शल' लिखा है. अभी उसने पागलपन की स्थिति पर अद्भुत संस्मरण लिखा है जिसमें से एक अभी 'कथादेश' में छपा था. यानी उस पीरियड को भी कैसे रचनात्मक ढंग से इस्तेमाल किया जा सकता है यह स्वदेश दीपक का अनुभव बताता है.
निराला, भुवनेश्वर, मुक्तिबोध और अब मटियानी क्या इन सबके साथ जो कुछ हुआ उसको देखकर ऐसा नहीं लगता कि एक लेखक सहायता कोष बनाया जाना चाहिए ताकि उन लेखकों को अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए राजनेताओं-अफसरों की चिरौरी न करनी पड़ी?
शुरू में मेरा एक कहानी संग्रह निकला था- 'देवताओं की मूर्ति' और अभी संस्मरण की किताब आई है- 'वे देवता नहीं हैं'. दोनों में अद्भुत साम्य है. उसमें भी एक ऐसे लेखक का चित्रण है जो देवतापन से आक्रांत है कि वह सबसे अलग है, महान है आदि. हम लोग एक तरह से उन्हें देवताओं की मूर्तियों की तरह स्थापित कर देते हैं.
इन सभी की ट्रेजेडी यह है कि जितने प्रतिभाशाली ये थे इतनी मान्यता उन्हें नहीं मिली, उतनी स्वीकृति नहीं मिली. उससे भी ज्यादा तकलीफ इस बात की है कि जिनमें कम प्रतिभा थी वो लोग अपने संपर्कों से, साधनों से, तिकड़मों से टॉप पर चले गए. ये एक स्थिति है जिससे मेरा ख्याल है मुक्ति संभव नहीं है. उपेक्षा का क्षेत्र और अनपेक्षित लोगों का जरूरत से ज्यादा अवसरों का दोहन. भुवनेश्वर जैसा ब्रिलियंट राइटर जो 'कारवां', 'भेड़िये' जैसी कहानी लिख सकता था. निराला, मटियानी के साथ भी यही हुआ.
मेरा प्रश्न था आर्थिक सहायता कोष के ढंग का कुछ बनाया जा सकता है.
आर्थिक सहायता भी जरूरी है परंतु उनकी समस्या आर्थिक नहीं है. आर्थिक सहायता का महत्त्व है या आर्थिक सहायता भी होनी ही चाहिए. मुझे नहीं मालूम कि ऐसा मेरे साथ होता तो क्या होता. लेकिन हमलोगों को इन सभी पर सहानुभूति से सोचना चाहिए. ये वाकई अनचैरिटेबल और अनसिम्पैथेटिक होगा कि अपनी इन स्थितियों के लिए वे खुद जिम्मेदार थे.
इसी संबंध में उनके द्वारा गोविंद मिश्र को लिखे पत्र का एक अंश याद आता है कि खासकर वामपंथी आलोचक लेखकों ने उनके लिए वे सारे दरवाजे बंदकर दिए जहां से उन्हें आर्थिक सहायता मिल सकती थी.
वे लोग उनकी सहायता कैसे कर सकते थे. साहित्य अकादेमी में उनकी स्मृति में गोष्ठी के लिए हॉल मांगा गया. उन्होंने यह कहते हुए हॉल देेने से मना कर दिया कि जो व्यक्ति जीवन भर अकादेमी की आलोचना करता रहा उसके लिए वे कैसे हाल दे सकते हैं. इसमें कहां से वामपंथ आ गया. चूंकि वामपंथी उनके विचारों को मान्यता नहीं देते थे इसलिए उन्हें शिकायत थी. इसलिए उन्हें लगता था कि जो उनका विरोध कर रहा है वह वामपंथी है. भारती कौन से वांमपंथी थे? जगदीश पीयूष कौन से वामपंथी थे? गलत ढंग से चीजों को अपने लिए बिन्दु कर लेने की एक मानसिकता एक पैरानोइया हो जाता है. भारती का तो दुश्मन भी नहीं कह सकता कि भारती वामपंथी थे और सबसे बड़ी सुप्रीम कोर्ट तक चलने वाली लड़ाई भारती से ही हुई.
आपको मटियानी की एक सबसे अच्छी कहानी और एक सबसे अच्छा उपन्यास चुनने को कहा जाए तो आप कौन सा चुनेंगे.
अगर मुझसे पूछा जाए तो मैं उनकी सबसे अच्छी कहानी 'अर्द्धांगिनी' को मानूंगा. उपन्यासों में तय करना थोड़ा सा मुश्किल है फिर भी 'बोरीवली से बोरीबंदर तक'.
'अर्धांगिनी' में स्त्री पुरूष के बीच का जो डेलिकेट रिलेशन है उसे उन्होंने बहुत ही लिरिकल ढंग से रखा है. बंबई के फुटपाथों की जिंदगी को 'बोरीवली से बोरीबंदर तक' में लिखा है जिसके लिए बाद में 'मुरदाघर' के रचनाकार जगदंबा प्रसाद दीक्षित मशहूर हुए. बाद में वे भी बीजेपी में चले गए. सारी वैचारिक घोषणाओं के बावजूद आज भी वे माले का अपने को कहते हैं परंतु समर्थन वे हिंदुत्व का, शिवसेना का करते हैं.
Monday, April 21, 2008
शाहरुख़ हिंदी भी लिखते हैं...
बीसीसी के द्वारा जारी चित्र-कथा शाहरुख़ ख़ान की पाँचवीं पास एक्सप्रेस की एक तस्वीर का अनुशीर्षक यानी कैप्शन शाहरुख़ हिंदी भी लिखते हैं.....वाकई मज़ेदार है.
अब लीजिए इस पूरी घटना की पड़ताल अपने पत्रकारिता के फाइव डब्ल्यू व वन एच वाले मुहावरे या हिन्दी के 6क से किया जाए. यानी हू, ह्वाट, ह्वेयर, ह्वेन, व ह्वाए तथा हाव. यानी कौन, क्या, कहाँ, कब व क्यों तथा कैसे. बताया जाता है कि इन प्रश्नों की पड़ताल से हम मुद्दे की सारी मौलिक जानकारियां पा सकते हैं. तो आजमाएँ.
पहला सवाल उठता है कि हू यानी कौन लिख रहा है. जाहिर है शाहरुख़ यानी किंग ख़ान लिख रहे हैं. शाहरुख़ को बोलते बहुत लोगों ने सुना है. अगर किसी चीज को दिल से चाहो तो पूरी क़ायनात....!!! लंबे लंबे डायलाग बोलते सुना है. मगर ये लिख रहे हैं जाहिर है दिनचर्या से हटकर बात है. हालांकि इन सितारों की दिनचर्या भी समाचार की सुर्ख़ियाँ बनती हैं और यह तो दिनचर्या से हटकर बात थी. वे लिख रहे हैं, शाहरुख़ लिख रहे हैं.
दूसरा सवाल है ह्वाट यानी क्या. किंग ख़ान क्या लिख रहे हैं. किंग ख़ान हिन्दी लिख रहे हैं. परम आश्चर्य और इसलिए समाचार बनने की ख़ूबियों से युक्त. चूंकि हिन्दी में लिख रहे हैं इसलिए यह महत्वपूर्ण हो गया है. अग्रेजी में लिखते तो दिनचर्या होती. शाहरुख़ हिन्दी में लिख रहे थे वाकई समाचार बनने वाली बात इसमें हैं. किंग ख़ान सिर्फ हिन्दी बोलना नहीं जानते बल्कि लिखना भी जानते हैं. पाँचवी पास लोग भी हिन्दी लिखना जानते हैं या कहें कि पाँचवी पास के पास जाने के लिए हिन्दी में लिखना जरूरी है.
तीसरा सवाल है ह्वेयर यानी कहाँ. यह सवाल भी दमदार है. शाहरुख़ हिन्दी लिख रहे हैं लेकिन कहाँ लिख रहे हैं? मौका था शाहरुख़ ख़ान की पाँचवीं पास एक्सप्रेस को मुंबई के बांद्रा इलाके से हरी झंडी दिखाने का और वहाँ शाहरुख़ को हिन्दी लिखना पड़ा. चौथी जिज्ञासा है ह्वेन यानी कब. जवाब है कल. कल इसलिए क्योंकि उनका क्या आप पाँचवीं पास से तेज़ हैं कार्यक्रम 25 अप्रैल से शुरू होने वाला है और उन्हें पाँचवीं पास एक्सप्रेस को झंडी दिखानी की जल्दी थी. पांचवी जरूरत ह्वाए यानी क्यों को जानने की है. उन्हें हिन्दी में क्यों लिखना पड़ा? वह इसलिए कि उन्हें कार्यक्रम का प्रचार-प्रसार करना है और इसलिए उन्हें हिन्दी में ही लिखना था.
अब आखिरी मगर महत्वपूर्ण प्रश्न बच जाता है कि उन्होंने हिन्दी हाव यानी कैसे लिखा. शाहरुख़ ने एक बड़ी-सी शीट पर, जिसके एक ओर एयरटेल के लोगो थे और दूसरी ओर गुब्बारे में छिपा संभवतः स्टार का लोगो होगा, एक मोटे से हरे रंग के स्केच पेन से लिखा - 'पढ़ते रहिए...आगे बढ़ते रहिए!' लेकिन लोगों को प्यार शायद वो अंग्रेजी में ही देना चाहते हैं इसलिए lots of ....शाहरुख़ का शुक्रिया कम से कम लोगों तक एक संदेश तो जाएगा कि एक ऐसा भी करोड़पति है जो हिन्दी भी लिख लेता है!!!
अब लीजिए इस पूरी घटना की पड़ताल अपने पत्रकारिता के फाइव डब्ल्यू व वन एच वाले मुहावरे या हिन्दी के 6क से किया जाए. यानी हू, ह्वाट, ह्वेयर, ह्वेन, व ह्वाए तथा हाव. यानी कौन, क्या, कहाँ, कब व क्यों तथा कैसे. बताया जाता है कि इन प्रश्नों की पड़ताल से हम मुद्दे की सारी मौलिक जानकारियां पा सकते हैं. तो आजमाएँ.
पहला सवाल उठता है कि हू यानी कौन लिख रहा है. जाहिर है शाहरुख़ यानी किंग ख़ान लिख रहे हैं. शाहरुख़ को बोलते बहुत लोगों ने सुना है. अगर किसी चीज को दिल से चाहो तो पूरी क़ायनात....!!! लंबे लंबे डायलाग बोलते सुना है. मगर ये लिख रहे हैं जाहिर है दिनचर्या से हटकर बात है. हालांकि इन सितारों की दिनचर्या भी समाचार की सुर्ख़ियाँ बनती हैं और यह तो दिनचर्या से हटकर बात थी. वे लिख रहे हैं, शाहरुख़ लिख रहे हैं.
दूसरा सवाल है ह्वाट यानी क्या. किंग ख़ान क्या लिख रहे हैं. किंग ख़ान हिन्दी लिख रहे हैं. परम आश्चर्य और इसलिए समाचार बनने की ख़ूबियों से युक्त. चूंकि हिन्दी में लिख रहे हैं इसलिए यह महत्वपूर्ण हो गया है. अग्रेजी में लिखते तो दिनचर्या होती. शाहरुख़ हिन्दी में लिख रहे थे वाकई समाचार बनने वाली बात इसमें हैं. किंग ख़ान सिर्फ हिन्दी बोलना नहीं जानते बल्कि लिखना भी जानते हैं. पाँचवी पास लोग भी हिन्दी लिखना जानते हैं या कहें कि पाँचवी पास के पास जाने के लिए हिन्दी में लिखना जरूरी है.
तीसरा सवाल है ह्वेयर यानी कहाँ. यह सवाल भी दमदार है. शाहरुख़ हिन्दी लिख रहे हैं लेकिन कहाँ लिख रहे हैं? मौका था शाहरुख़ ख़ान की पाँचवीं पास एक्सप्रेस को मुंबई के बांद्रा इलाके से हरी झंडी दिखाने का और वहाँ शाहरुख़ को हिन्दी लिखना पड़ा. चौथी जिज्ञासा है ह्वेन यानी कब. जवाब है कल. कल इसलिए क्योंकि उनका क्या आप पाँचवीं पास से तेज़ हैं कार्यक्रम 25 अप्रैल से शुरू होने वाला है और उन्हें पाँचवीं पास एक्सप्रेस को झंडी दिखानी की जल्दी थी. पांचवी जरूरत ह्वाए यानी क्यों को जानने की है. उन्हें हिन्दी में क्यों लिखना पड़ा? वह इसलिए कि उन्हें कार्यक्रम का प्रचार-प्रसार करना है और इसलिए उन्हें हिन्दी में ही लिखना था.
अब आखिरी मगर महत्वपूर्ण प्रश्न बच जाता है कि उन्होंने हिन्दी हाव यानी कैसे लिखा. शाहरुख़ ने एक बड़ी-सी शीट पर, जिसके एक ओर एयरटेल के लोगो थे और दूसरी ओर गुब्बारे में छिपा संभवतः स्टार का लोगो होगा, एक मोटे से हरे रंग के स्केच पेन से लिखा - 'पढ़ते रहिए...आगे बढ़ते रहिए!' लेकिन लोगों को प्यार शायद वो अंग्रेजी में ही देना चाहते हैं इसलिए lots of ....शाहरुख़ का शुक्रिया कम से कम लोगों तक एक संदेश तो जाएगा कि एक ऐसा भी करोड़पति है जो हिन्दी भी लिख लेता है!!!
Tuesday, April 15, 2008
पहले दो के पेट भरे हुए थे
अभी मसिजीवी ने महगाईं पर लिखा है. बढ़िया लिखा है! बढ़िया विषय भी है! आखिर हम क्यों नहीं लिख पाते हैं या यूँ कहें कि सहानुभूति या तदनुभूति के आधार पर भी दूसरे के दर्द को समझ क्यों नहीं पाते हैं. हिन्दी के कवि व आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी ने एक बार कार्यक्रम में बताया कि आखिर महंगाई में आटा गीला का मुहावरा क्यों आया. आलू की सब्जी में थोड़ा ज्यादा पानी हो जाए तो कोई बात नहीं लेकिन थोड़ा पानी आटा में अधिक चला जाए तो रोटी कैसे बनेगी...आटा तो और है नहीं. उनके कथन को 'मोट तौर पर'
यही अर्थ था. हमारे नहीं लिख पाने का कारण शायद यह है कि अगर कभी आटा गीला हो भी जाता है तो हम और आटा उसमें मिला कर संतुलित कर लेते हैं. तो क्या हम इसलिए नहीं लिख पाते हैं कि यह दर्द हमारे संदर्भों से मेल नहीं खाता...इसलिए हम अब मुहावरों का अर्थ तो समझते हैं लेकिन उसके होने के माएने नहीं जानते. इसलिए आटा तो लगातार गीला होता जा रहा है लेकिन हमारी रोटी तो बनती जा रही है.
मुझे एक कविता याद आ रही है...शायद सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की है (यदि मैं गलत होऊँ तो कृपया सुधारें)...
गोली खाकर
एक के मुँह से निकला - राम
दूसरे ने कहा - माओ
तीसरे ने बोला - रोटी
पोस्टमार्टम की रिपोर्ट है
पहले दो के पेट भरे हुए थे
जाहिर है मैं खुद से इसकी उम्मीद क्यों नहीं कर सकता हूँ तो वजह साफ है. मैं उस दर्द को लिख पाऊँ कि भूख क्या होती है... मुश्किल है. मैंने मटियानी की कुछ कहानियां पढ़ी हैं...उनके संस्मरण पढ़े हैं. लेकिन उनकी लेखनी से भूख की तिलमिलाहट को महसूस कर सकता हूँ. 'बुद्धिजीवियों' के बीच इस बहस को चलाने के लिए मसिजीवी को धन्यवाद.
यही अर्थ था. हमारे नहीं लिख पाने का कारण शायद यह है कि अगर कभी आटा गीला हो भी जाता है तो हम और आटा उसमें मिला कर संतुलित कर लेते हैं. तो क्या हम इसलिए नहीं लिख पाते हैं कि यह दर्द हमारे संदर्भों से मेल नहीं खाता...इसलिए हम अब मुहावरों का अर्थ तो समझते हैं लेकिन उसके होने के माएने नहीं जानते. इसलिए आटा तो लगातार गीला होता जा रहा है लेकिन हमारी रोटी तो बनती जा रही है.
मुझे एक कविता याद आ रही है...शायद सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की है (यदि मैं गलत होऊँ तो कृपया सुधारें)...
गोली खाकर
एक के मुँह से निकला - राम
दूसरे ने कहा - माओ
तीसरे ने बोला - रोटी
पोस्टमार्टम की रिपोर्ट है
पहले दो के पेट भरे हुए थे
जाहिर है मैं खुद से इसकी उम्मीद क्यों नहीं कर सकता हूँ तो वजह साफ है. मैं उस दर्द को लिख पाऊँ कि भूख क्या होती है... मुश्किल है. मैंने मटियानी की कुछ कहानियां पढ़ी हैं...उनके संस्मरण पढ़े हैं. लेकिन उनकी लेखनी से भूख की तिलमिलाहट को महसूस कर सकता हूँ. 'बुद्धिजीवियों' के बीच इस बहस को चलाने के लिए मसिजीवी को धन्यवाद.
साईं © आस्था
रेडिफ़ से गुजरते हुए मैं साईं दर्शन के वीडियो पर पहुँच गया. वीडियो पूरा देखा. अंत में लिखा था © आस्था. इस बात ने सबसे ज्यादा मुझे हैरान किया कि यहां कॉपीराइट वाली क्या बात हो गई. सार्वजनिक रूप से मंदिर में आरती हो रही है, भजन चल रहे हैं उसे आपने फिल्मा लिया और उस चेप दिया © आस्था. यह तो तमाशा हो गया. जो चीज सार्वजनिक है या यूँ कहें कि जिस व्यक्ति ने अपना पूरा जीवन लोगों के लिए लगा दिया, लोगों को आदमी बनने के उपदेश दिए, जैसा कि लाखों-करोडों लोग मानते हैं, उसी के लिए सार्वजनिक रूप से हो रही आरती को आस्था चैनल ने कॉपीराइट के दायरे में ला दिया.
यूँ इसमें कोई आश्चर्य की बात होनी भी नहीं चाहिए क्योंकि धर्म से जुड़े मामलों पर कॉपीराइट का कब्जा बहुत दिनों से है. वैसे हमारे यहां चलन है, हर धर्म में चलन है ...हम धर्म को धंधे में बदल देते हैं और कुछ लोगों की बपौती में तब्दील कर देते हैं. कमोबेश सभी धर्म के कॉपीराइट कानून कॉफी सख्त रहे हैं!! कुछ जगह तो प्रयोग की भी छूट नहीं है - कौन वेद पढ़ सकता है कौन नहीं इसपर पूरी संहिताएं हैं. फिर भी पता नहीं क्यों © संकेत साईं की वीडियो पर देखकर अजीब सा लगा और लगा इसे नहीं होना चाहिए था. अरे आप यह लिख देते - आस्था की ओर से...लेकिन कॉपीराइट लिखने के बड़े खास मायने होते हैं और आप नाहक साईं के भक्तों के साईं को दूसरों को दिखाने से रोक रहे हैं. साईं न हो गए सॉफ्टवेयर के प्रोग्राम हो गए...लीजिए आजकल सॉफ्टवेयर भी क्रियेटिव कॉमन्स के तहत जारी हो रहे हैं लेकिन आस्था वालों की दुस्साहस ही हम कहेंगे कि उन्होंने साईं के भजन की वीडियो बनाई और उसका कॉपीराइट जारी कर दिया. मुझे याद नहीं कि गीताप्रेस गोरखपुर की किताबों में यह कॉपीराइट घोषणा कैसे रहती है. वैसे क्या यह रोचक नहीं होगा कि इन चीजों पर शोध किया जाए :D.
यूँ इसमें कोई आश्चर्य की बात होनी भी नहीं चाहिए क्योंकि धर्म से जुड़े मामलों पर कॉपीराइट का कब्जा बहुत दिनों से है. वैसे हमारे यहां चलन है, हर धर्म में चलन है ...हम धर्म को धंधे में बदल देते हैं और कुछ लोगों की बपौती में तब्दील कर देते हैं. कमोबेश सभी धर्म के कॉपीराइट कानून कॉफी सख्त रहे हैं!! कुछ जगह तो प्रयोग की भी छूट नहीं है - कौन वेद पढ़ सकता है कौन नहीं इसपर पूरी संहिताएं हैं. फिर भी पता नहीं क्यों © संकेत साईं की वीडियो पर देखकर अजीब सा लगा और लगा इसे नहीं होना चाहिए था. अरे आप यह लिख देते - आस्था की ओर से...लेकिन कॉपीराइट लिखने के बड़े खास मायने होते हैं और आप नाहक साईं के भक्तों के साईं को दूसरों को दिखाने से रोक रहे हैं. साईं न हो गए सॉफ्टवेयर के प्रोग्राम हो गए...लीजिए आजकल सॉफ्टवेयर भी क्रियेटिव कॉमन्स के तहत जारी हो रहे हैं लेकिन आस्था वालों की दुस्साहस ही हम कहेंगे कि उन्होंने साईं के भजन की वीडियो बनाई और उसका कॉपीराइट जारी कर दिया. मुझे याद नहीं कि गीताप्रेस गोरखपुर की किताबों में यह कॉपीराइट घोषणा कैसे रहती है. वैसे क्या यह रोचक नहीं होगा कि इन चीजों पर शोध किया जाए :D.
Friday, April 11, 2008
पिज़िन क्या है
आजकल सामान्य पाठ आधारित बात-चीत के लिए ऑनलाइन मैसेंजर काफी लोकप्रिय है. पिज़िन एक मल्टी प्रोटोकॉल इस्टैंट मैसेजिंग क्लाइंट है जो आपको अपने सारे इस्टैंट मैसेंजर को एक साथ एक ही समय में प्रयोग करने में सक्षम बनाता है. इसी पिज़िन को गैम नाम से भी जाना जाता रहा है परंतु कुछ कानूनी कारणों से उस नाम का उपयोग बंद हो गया है और अब उस पुराने गैम को अब पिज़िन के नाम से जाना जाता है.
पिज़िन निम्नलिखित के लिए काम करता है: AIM, Bonjour, Gadu-Gadu, Google Talk, Groupwise, ICQ, IRC, MSN, MySpaceIM QQ, SILC, SIMPLE, Sametime, XMPP, Yahoo! और Zephyr.
इस पिज़िन को लोकलाइज करने के लिए पिज़िन के डेवलेपर अनुवाद इच्छुक समुदाय का समर्थन करती है. यदि आप अपने लोकेल में इसे अनुवाद करना चाहते हैं तो सबसे पहले इस कड़ी पर देखिए इसपर पहले से तो काम नहीं हो रहा है जैसा आप किसी भी दूसरे ओपन सोर्स प्रोजेक्ट के लिए किया जाता है. फिर यदि सक्रिय रूप से काम हो रहा है या नहीं हो रहा है दोनों स्थितियों में आप पिज़िन के अनुवादक की सूची पर मेल कर सकते हैं. सूची का आईडी है translators@pidgin.im और सदस्यता आप यहां से ले सकते हैं.
यदि आपकी भाषा के लिए अबतक काम चालू नहीं हुआ है तो फिर भी आपको इसी सूची पर लिखना है कि किसी ने अबतक कोई काम शुरू तो नहीं किया है तो भी आपको इसी सूची पर मेल भेजना है. फिर अनुवाद सौंपने के लिए एक इस्यू बनाइए और अनुवाद सुपुर्द कीजिए.
जरूरी कड़ियां व संदर्भ :
पिज़िन डेवलेपर
अनुवादक के लिए सुझाव
पिज़िन अनुवादक मेलिंग लिस्ट
फाइल सौंपने के लिए इस्यू
पिज़िन निम्नलिखित के लिए काम करता है: AIM, Bonjour, Gadu-Gadu, Google Talk, Groupwise, ICQ, IRC, MSN, MySpaceIM QQ, SILC, SIMPLE, Sametime, XMPP, Yahoo! और Zephyr.
इस पिज़िन को लोकलाइज करने के लिए पिज़िन के डेवलेपर अनुवाद इच्छुक समुदाय का समर्थन करती है. यदि आप अपने लोकेल में इसे अनुवाद करना चाहते हैं तो सबसे पहले इस कड़ी पर देखिए इसपर पहले से तो काम नहीं हो रहा है जैसा आप किसी भी दूसरे ओपन सोर्स प्रोजेक्ट के लिए किया जाता है. फिर यदि सक्रिय रूप से काम हो रहा है या नहीं हो रहा है दोनों स्थितियों में आप पिज़िन के अनुवादक की सूची पर मेल कर सकते हैं. सूची का आईडी है translators@pidgin.im और सदस्यता आप यहां से ले सकते हैं.
यदि आपकी भाषा के लिए अबतक काम चालू नहीं हुआ है तो फिर भी आपको इसी सूची पर लिखना है कि किसी ने अबतक कोई काम शुरू तो नहीं किया है तो भी आपको इसी सूची पर मेल भेजना है. फिर अनुवाद सौंपने के लिए एक इस्यू बनाइए और अनुवाद सुपुर्द कीजिए.
जरूरी कड़ियां व संदर्भ :
पिज़िन डेवलेपर
अनुवादक के लिए सुझाव
पिज़िन अनुवादक मेलिंग लिस्ट
फाइल सौंपने के लिए इस्यू
Wednesday, April 9, 2008
तो हिन्दी कंप्यूटर का कोई भविष्य नहीं है
अभी-अभी हमारे अजीज मित्र ने यही सवाल दुहराया तो मेरे मुंह से निकल ही गया, कौन कहता है कि हिन्दी कंप्यूटर का कोई भविष्य नहीं है, कौन कहता है लोकलाइजेशन का कोई भविष्य नहीं है. मेरे वो मित्र भी कंप्यूटर स्थानीयकरण (लोकलाइजेशन) के काम से पिछले कई वर्षों से जुड़े हैं और भाषा और उनसे जुड़े सवाल को लेकर काफी परेशान रहते हैं. लोग बार-बार इन कोशिशों पर सवाल उठाते हैं लेकिन यदि यह गैर-जरूरी है तो फिर बहुत सारे सवाल उठने लगते हैं.
पहला सवाल तो यह उठता है कि यदि स्थानीयकरण का कोई भविष्य नहीं है तो फिर बड़ी कंपनियां इस रास्ते की ओर क्यों बढ़ती हैं?! यह एक ही साथ प्रश्न व विस्मय दोनों पैदा करता है. खासकर बड़ी मालिकाना स्वभाव की कंपनियों के लिए जहां लाभ ही पहली व आखिरी ख्वाहिश है, जहां हर कदम के लिए सर्वेक्षण कराए जाते हैं वह फिर इस ओर क्यों आ रही हैं. अब देखिए, याहू, एमएसएन, एओएल जैसी इंटरनेट की कई बड़ी कंपनियों ने हिन्दी सहित कई भाषाओं की ओर रूख किया है. छोड़िए कंपनियों की बात, यदि इसका भविष्य नहीं है तो फिर किसी हिन्दी डेस्कटॉप को देखकर आपके-हमारे मन खुश क्यों हो जाता है क्यों हम अपनी जिज्ञासा को दबा नहीं पाते हैं और जाकर देखते हैं कि देखूं तो कैसा दिखता है हमारा हिन्दी का डेस्कटॉप. जब अंग्रेजी जानने वाले आप जैसे लोगों का मन हिन्दी को देखकर गुदगुदाने लगता है तो फिर उनके लिए सोचिए जिन्हें ए बी सी भी नहीं आता है ;-).
कोई भी तकनीक कैसे फैलती है यह बड़े शोध का विषय है और इस पर बड़े काम भी हुए हैं. अब देखिए, जहां तक हिन्दी डेस्कटॉप की बात है तो यह कंप्यूटर अभी भी ज्यादातर उन्हीं लोगों के बीच घूम रही है जो अंग्रेजी भी जानते हैं. फर्ज कीजिए कि अंग्रेजी न जानने वाला इसे उपयोग में लाना तो फिर वह क्या करेगा. उसे तो कुंजी के A, B, C भी अनजाने लगेंगे. बीसेक साल पहले के टेलिविजन को देखें ...बेवाच की सुंदरियों का स्थान एकता कपूर की सोप-ओपेराओं ने ले लिया. उस समय के समाचार चैनल को भी याद करें...यहां तक कि दस साल पहले के समाचार चैनलों की तो आप आसानी से डेस्कटॉप व इंटरनेट पर हिन्दी की स्थिति से बहुत दुखी न होंगे. भारत के दस सबसे अखबारों में अंग्रेजी का एक ही अखबार आता है. फर्ज कीजिए यूनीकोड समर्थित फॉन्ट ही सिर्फ लोग उपयोग में लाना शुरू कर दें तो फिर कितनी हिन्दी की सामग्रियां जमा हो जाएंगी. ऐसा होना सिर्फ फर्ज करने की बात नहीं है, यह बस कुछेक सालों के अंदर होना ही है.
सच कहें तो हम अभी आधे-अधूरे स्थानीयकरण के दौर से गुजर रहे हैं और खासकर पिछले तीन-चार वर्षों की ही तरक्की इसकी विरासत है. स्थानीयकरण का अर्थ सही रूप से सिर्फ भाषा अनुवाद ही नहीं कर देना है बल्कि स्थानीयकरण कई स्तरों पर किए जाने की जरूरत है जैसे स्थानीय अंतर्वस्तु, रीति-रिवाज, संकेत प्रणाली, सॉर्टिंग, सांस्कृतिक मूल्यों व संदर्भों के साथ सौंदर्यानुभूति की दृष्टि से स्थानीयकरण की जरूरत है और धीरे-धीरे जरूर उस ओर भी बढ़ा जाएगा. और फिर दुनिया हमारी हिन्दी की होगी. मुझे तो लगता है कि यही बाजार और उदारीकरण व भूमंडलीकरण की नीतियां जो फिलहाल हमें दुखी कर रही हैं हमें और हमारी भाषा को आगे बढ़ाने में सबसे कारगर होंगी.
पहला सवाल तो यह उठता है कि यदि स्थानीयकरण का कोई भविष्य नहीं है तो फिर बड़ी कंपनियां इस रास्ते की ओर क्यों बढ़ती हैं?! यह एक ही साथ प्रश्न व विस्मय दोनों पैदा करता है. खासकर बड़ी मालिकाना स्वभाव की कंपनियों के लिए जहां लाभ ही पहली व आखिरी ख्वाहिश है, जहां हर कदम के लिए सर्वेक्षण कराए जाते हैं वह फिर इस ओर क्यों आ रही हैं. अब देखिए, याहू, एमएसएन, एओएल जैसी इंटरनेट की कई बड़ी कंपनियों ने हिन्दी सहित कई भाषाओं की ओर रूख किया है. छोड़िए कंपनियों की बात, यदि इसका भविष्य नहीं है तो फिर किसी हिन्दी डेस्कटॉप को देखकर आपके-हमारे मन खुश क्यों हो जाता है क्यों हम अपनी जिज्ञासा को दबा नहीं पाते हैं और जाकर देखते हैं कि देखूं तो कैसा दिखता है हमारा हिन्दी का डेस्कटॉप. जब अंग्रेजी जानने वाले आप जैसे लोगों का मन हिन्दी को देखकर गुदगुदाने लगता है तो फिर उनके लिए सोचिए जिन्हें ए बी सी भी नहीं आता है ;-).
कोई भी तकनीक कैसे फैलती है यह बड़े शोध का विषय है और इस पर बड़े काम भी हुए हैं. अब देखिए, जहां तक हिन्दी डेस्कटॉप की बात है तो यह कंप्यूटर अभी भी ज्यादातर उन्हीं लोगों के बीच घूम रही है जो अंग्रेजी भी जानते हैं. फर्ज कीजिए कि अंग्रेजी न जानने वाला इसे उपयोग में लाना तो फिर वह क्या करेगा. उसे तो कुंजी के A, B, C भी अनजाने लगेंगे. बीसेक साल पहले के टेलिविजन को देखें ...बेवाच की सुंदरियों का स्थान एकता कपूर की सोप-ओपेराओं ने ले लिया. उस समय के समाचार चैनल को भी याद करें...यहां तक कि दस साल पहले के समाचार चैनलों की तो आप आसानी से डेस्कटॉप व इंटरनेट पर हिन्दी की स्थिति से बहुत दुखी न होंगे. भारत के दस सबसे अखबारों में अंग्रेजी का एक ही अखबार आता है. फर्ज कीजिए यूनीकोड समर्थित फॉन्ट ही सिर्फ लोग उपयोग में लाना शुरू कर दें तो फिर कितनी हिन्दी की सामग्रियां जमा हो जाएंगी. ऐसा होना सिर्फ फर्ज करने की बात नहीं है, यह बस कुछेक सालों के अंदर होना ही है.
सच कहें तो हम अभी आधे-अधूरे स्थानीयकरण के दौर से गुजर रहे हैं और खासकर पिछले तीन-चार वर्षों की ही तरक्की इसकी विरासत है. स्थानीयकरण का अर्थ सही रूप से सिर्फ भाषा अनुवाद ही नहीं कर देना है बल्कि स्थानीयकरण कई स्तरों पर किए जाने की जरूरत है जैसे स्थानीय अंतर्वस्तु, रीति-रिवाज, संकेत प्रणाली, सॉर्टिंग, सांस्कृतिक मूल्यों व संदर्भों के साथ सौंदर्यानुभूति की दृष्टि से स्थानीयकरण की जरूरत है और धीरे-धीरे जरूर उस ओर भी बढ़ा जाएगा. और फिर दुनिया हमारी हिन्दी की होगी. मुझे तो लगता है कि यही बाजार और उदारीकरण व भूमंडलीकरण की नीतियां जो फिलहाल हमें दुखी कर रही हैं हमें और हमारी भाषा को आगे बढ़ाने में सबसे कारगर होंगी.
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