Thursday, December 4, 2008

मुंबई ब्लास्ट: संदर्भ मौज-मजे की लेखिका शोभा डे

मैंने सुना है कि शोभा डे बोल रही थीं कि चूँकि 'वे' अधिक करों का भुगतान करते हैं इसलिए 'उन्हें' अधिक सुरक्षा चाहिए. मौज-मजे के थीम पर किताबें लिखने वाली लेखिका और सबसे महत्वपूर्ण रूप से अंग्रेजी की लेखिका होने के नाते वे दुःसाहस कर सकती हैं. लेकिन मैं इसे बौद्धिक दिवालियापन से अधिक नहीं मानता हूँ. दिवालियापन से बेहतर होगा बौद्धिक धूर्तता या व्यावसायिक चतुराई. आखिर इनके पाठक तो उसी वर्ग के हैं जिस वर्ग को उन्मुख होकर ये लिखती हैं. फर्ज कीजिए कि यह आतंकवादी घटना सिर्फ रेलवे स्टेशन पर होकर रह गई होती...तो क्या इतना ही हंगामा मचता. मुंबई का धमाका सचमुच कुछ लीक से हटकर है।

4 comments:

222222222222 said...

दरअसल, ऐसा ही कुछ कल हाथ में लैंप थामें प्रीति जिंटा कह रही थीं।

Unknown said...

सही लिखा है, यह बात तो काफ़ी पहले से लोग कह रहे हैं कि चूंकि हमला अमीरों पर और विदेशियों पर हुआ है और मीडिया ने इसे जरूरत से अधिक "भंभोड़ा" है इसीलिये ये सारी हायतौबा मचाई जा रही है, यदि सिर्फ़ स्टेशन पर ही यह हमला हुआ होता तो देशमुख रामगोपाल वर्मा को वहाँ न ले जाते… मोमबत्तियाँ जलाने वाले अधिकतर लोग दोमुँहे हैं…

डॉ .अनुराग said...

आप काहे को उन्हें इतना सीरियस लेते है.???...वैसे इस वक़्त देश के मुद्दे पर सब बोले यही ठीक है

Shashwat Shekhar said...

हर बार आतंकवादी हमला करते हैं तो लोग मारे जाते हैं, इस बार ऐसा क्या हुआ की इसे वर करार दे दिया गया? ५ स्टार होटल था इसलिए?